Friday, August 21, 2026
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का योगदान काली शंकर उपाध्याय की कलम से

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों का योगदान
काली शंकर उपाध्याय की कलम से

उत्तर प्रदेश की सियासत को अगर कोई एक धागा सबसे मजबूती से पिरोता है, तो वो ब्राह्मण समाज है। ये सिर्फ जाति की बात नहीं, उस वैचारिक धारा की बात है जिसने यूपी को दिशा दी, दशा बदली और जब-जब सूबा लड़खड़ाया, उसे संभाला।

आजादी से पहले नींव रखने वाले
गणेश शंकर विद्यार्थी ने कलम को तलवार बनाया। प्रताप अखबार सिर्फ खबर नहीं छापता था, क्रांति छापता था। मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय देकर यूपी को शिक्षा की राजधानी बना दी। पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने जमींदारी उन्मूलन का कानून लाकर गरीब के घर में पहली बार चूल्हा जलवाया। ये लोग ब्राह्मण थे, पर इनकी लड़ाई किसी जाति के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए थी।

यूपी को मुख्यमंत्री देने वाली परंपरा
आजाद भारत में यूपी की कमान सबसे ज्यादा ब्राह्मण नेताओं के हाथ में रही। गोविंद बल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी – ये नाम सिर्फ कुर्सी के नहीं, काम के थे। एनडी तिवारी ने उत्तराखंड बनने से पहले यूपी को इंडस्ट्रियल मैप पर ला दिया। हिल से लेकर मैदान तक, बिजली से लेकर सड़क तक, इनकी नीतियों की छाप आज भी दिखती है।

विचारधारा गढ़ने वाले मस्तिष्क
यूपी की राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं, विचारों से चलती है। दीन दयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानववाद” देकर राजनीति को गरीबोन्मुखी बनाया। अटल बिहारी वाजपेयी ने कविता और राजनीति को एक कर दिया – जुबान ऐसी कि विरोधी भी सिर झुकाए। ये वो लोग थे जो वोट के लिए नहीं, विजन के लिए याद किए जाते हैं।

4. हर दल की रीढ़
कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो या बसपा – ब्राह्मण चेहरा हर जगह निर्णायक रहा। कांग्रेस के दिन लाने वाले कमलापति त्रिपाठी थे। भाजपा को यूपी में खड़ा करने वाले कलराज मिश्र, केशरी नाथ त्रिपाठी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग सतीश चंद्र मिश्रा के बिना अधूरी थी। अखिलेश की टीम में भी ब्राह्मण चेहरों की भरमार रही। वजह साफ है – जमीन पर पकड़, बूथ की समझ और मुद्दों को धार देने की कला।

5. आज भी किंगमेकर
2017 हो या 2022, ब्राह्मण वोट के बिना यूपी में सरकार नहीं बनती। 14% आबादी, पर असर 40% सीटों पर। क्यों? क्योंकि ये समाज सिर्फ अपना नहीं सोचता। मंदिर का पुजारी भी है और यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर भी। किसान भी है और वकील भी। गाँव की चौपाल से लेकर लखनऊ के एसी कमरों तक, हर जगह इसकी आवाज है।

पर सवाल ये भी है – अब आगे क्या?
पुराना गौरव ठीक है, पर नई पीढ़ी क्या कर रही है? क्या सिर्फ इतिहास के नाम पर वोट माँगेंगे या भविष्य का रोडमैप देंगे? ब्राह्मण समाज को अब “किंगमेकर” से “किंग” बनने की सोच छोड़कर “किंगडम” बनाने की सोच रखनी होगी – ऐसी यूपी जहाँ जाति पूछे बिना नौकरी मिले, बिना सिफारिश के इंसाफ मिले।

मैं काली शंकर उपाध्याय, एक ब्राह्मण होने से पहले यूपी का बेटा हूँ। इसलिए कहता हूँ – योगदान गिनाने से बड़ा काम योगदान जारी रखना है। यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों ने दीया जलाया था, अब मशाल थामने का वक्त है।

अगर दीया बुझा, तो अँधेरा सिर्फ एक जाति का नहीं, पूरे प्रदेश का होगा।

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