राजनीति: सेवा या व्यवसाय
काली शंकर उपाध्याय की कलम से
राजनीति क्या है? एक ज़माने में इसे त्याग और सेवा का नाम दिया जाता था। आज उसी राजनीति को देखकर लगता है कि यह सबसे बड़ा व्यवसाय बन गई है, जहाँ मुनाफे की गणना वोटों से नहीं, नोटों से होती है।
जब राजनीति सेवा थी
लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे, पर उनके बेटे को लोन न मिलने पर पत्नी को गहने गिरवी रखने पड़े। नेता के घर में भूखे लोग रोटी खाते थे और नेता खुद दो जोड़ी कुर्ते में जीवन काट देता था। सेवा का मतलब था जनता की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना।
जब राजनीति व्यवसाय बन गई
आज टिकट बिकते हैं, वोट बिकते हैं, विधायक बिकते हैं। चुनाव लड़ने के लिए ठेकेदार पैसा लगाते हैं और जीतने के बाद दस गुना वसूलते हैं। सड़क, पुल, स्कूल – सब पर कमीशन तय है। जनता को लगता है नेता सेवा कर रहा है, असल में वो अपने निवेश पर ब्याज कमा रहा है।
दोष किसका?
दोष सिर्फ नेता का नहीं। हम जाति देखते हैं, धर्म देखते हैं, 500 का नोट देखते हैं, पर चरित्र नहीं देखते। जब मतदाता खुद बिकने को तैयार हो तो खरीददार तो लाइन लगाएँगे ही।
रास्ता क्या है?
राजनीति फिर से सेवा तब बनेगी जब हम ऐसे आदमी को वोट देंगे जिसके पास खोने को कुछ न हो, पाने को सिर्फ जनता का आशीर्वाद हो। हमें पूछना होगा – 5 साल में तुम्हारी संपत्ति 10 गुना कैसे बढ़ी? हिसाब माँगना होगा।
मैं काली शंकर उपाध्याय, इस मिट्टी का बेटा, इतना ही कहूँगा – नेता बदलने से कुछ नहीं होगा, नियत बदलनी पड़ेगी। और नियत तब बदलेगी जब जनता जागेगी।
जय हिंद, जय भारत







