Friday, August 21, 2026
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हे श्रेष्ठ! तेरे दरस की प्यास है 

हे केशव!

 

हे श्रेष्ठ! तेरे दरस की प्यास है

नित नूतन माधव!

तू ही तो मेरा विश्वास है

तेरे कमल नयन मेरे हिय को महकाते है

मेरे उदास ह्रदय को प्रफुल्लित कर जाते है

हे गोपाला! तू ही तो अब मेरा प्रश्रय है

तेरे श्री चरणों में अब मेरा आश्रय है

दयानिधि ! रंग में तेरे रंग गई मैं तो

हे मुरलीधर! तेरे दरस से सँवर गई मैं तो

रोम-रोम मेरा अब तो हरि धुन ही गाए

कान्हा! तेरे कुंतलपाश आवर्त में,

फँसी है गोपिकायें

तेरे श्याम रंग से निखर गई दासी

मन ये अधीर है दरस की हूँ प्यासी

जी चाहे तोड़ दूँ आज हर बाधा

मै हूँ तेरी मीरा,मैं हूँ तेरी राधा

मुरली बन जाऊँ पिऊँ अधरों का

प्याला

झूम जाऊँ पी के तेरे नयनों की हाला

मोरपंख बन तेरा शीश मैं सजाऊँ

मोतियन माला बन तेरे उर में बस जाऊँ

कहाँ मैं मुरारी जाऊँ और मेरा ठौर नहीं,

तू ही मेरा सब कुछ है,दूजा कोई और नहीं

राधेश्याम, राधेकृष्ण,केशव,बिहारी

मैं तो खुद को भूली हूँ, सुध लो मुरारी।।

 

पारुल राज (दिल्ली )

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