Thursday, August 20, 2026

तरुणाई से चिरायु तक का सफ़र:एक समर्पित कांग्रेसी योद्धा परमा नन्द तिवारी 

तरुणाई से चिरायु तक का सफ़र:एक समर्पित कांग्रेसी योद्धा परमा नन्द तिवारी 

 

 

राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं होती, बल्कि कुछ लोगों के लिए यह विचार, विश्वास और आजीवन समर्पण का नाम होती है। ऐसे ही व्यक्तित्व थे स्वर्गीय परमा नन्द तिवारी, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय किसी पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक सिद्धांतों और कांग्रेस की विचारधारा के प्रति अटूट निष्ठा के साथ व्यतीत किया।

 

सन् 1963 में लेहरा खास अविभाज्य जिला वाराणसी में जन्मे परमा नन्द तिवारी का राजनीतिक जीवन उस समय प्रारंभ हुआ,जब अधिकांश युवा अपने भविष्य की दिशा तलाश रहे होते हैं। मात्र 15 वर्ष की आयु में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और उनकी नीतियों से इतने प्रभावित हुए कि वर्ष 1978 में सत्याग्रही आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और जेल भी गए। इतनी कम आयु में जेल जाना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था, बल्कि अपने विचारों के प्रति अटूट विश्वास और साहस का परिचायक था।

 

यहीं से प्रारंभ हुआ उनका कांग्रेस के प्रति समर्पण का वह सफर, जो जीवन की अंतिम सांस तक निरंतर चलता रहा। वर्ष 1986 में उन्होंने कस्तूरबा ग्राम में प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसी दौरान तत्कालीन कृषि राज्य मंत्री श्याम लाल यादव की दृष्टि इस ऊर्जावान युवा कांग्रेसी पर पड़ी। उनकी सक्रियता, निष्ठा और संगठन के प्रति समर्पण से प्रभावित होकर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से परमा नन्द तिवारी का उल्लेख किया। इसके बाद उन्हें दिल्ली बुलाया गया, जहाँ राजीव गांधी ने उनसे विशेष रूप से मुलाकात कर उनका उत्साहवर्धन किया। किसी साधारण कार्यकर्ता के लिए यह क्षण केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि उसके समर्पण की पहचान भी था।

 

समय बदलता गया, राजनीति के रंग बदलते गए, परिस्थितियाँ बदलती रहीं। वाराणसी से चंदौली जनपद का गठन हुआ, अनेक नेताओं ने अपने राजनीतिक हितों के अनुसार दल बदले, विचारधाराएँ बदलीं और अवसरों के अनुसार नए रास्ते चुन लिए। किंतु परमा नन्द तिवारी का विश्वास कभी नहीं डगमगाया। वे जिस विचारधारा से युवावस्था में जुड़े, उसी के साथ जीवन भर अडिग रहे। उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने सिद्धांतों का सौदा नहीं किया।

 

उन्होंने कांग्रेस संगठन में एक साधारण कार्यकर्ता से लेकर जिला कार्यकारिणी तक अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। वे संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं के सम्मान और जनसरोकारों के प्रति सदैव समर्पित रहे। हाल के वर्षों में आयोजित भारत जोड़ो यात्रा जैसी पहलों में भी उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ सहभागिता की और अंतिम समय तक स्वयं को कांग्रेस की विचारधारा का सच्चा सिपाही बनाए रखा।

 

29 जून 2026 का दिन उनके जीवन की अंतिम तिथि बन गया। उस दिन एक ऐसा कांग्रेसी योद्धा इस संसार से विदा हो गया, जिसने अपने तन, मन और जीवन को कांग्रेस के आदर्शों के लिए समर्पित कर दिया था। उनका अंतिम संस्कार भी कांग्रेस के झंडे में लिपटे हुए हुआ। यह दृश्य केवल एक कार्यकर्ता की विदाई नहीं, बल्कि उस अटूट निष्ठा का प्रतीक था, जो आज के दौर में विरले ही देखने को मिलती है।

 

परमा नन्द तिवारी अपने पीछे अपने दो छोटे भाइयों एवं एक बहन कृष्णा नन्द तिवारी,अन्नपूर्णा पांडेय तथा सच्चिदा नन्द तिवारी “सचिन” को छोड़ गए हैं। परिवार के लिए यह केवल एक बड़े भाई का बिछोह नहीं,बल्कि एक मार्गदर्शक,संरक्षक और प्रेरणा स्रोत का चले जाना है। उनका स्नेह, अनुशासन, संघर्ष और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेंगे।

 

आज जब राजनीति में विचारधारा से अधिक अवसरवाद की चर्चा होती है, तब परमा नन्द तिवारी जैसे व्यक्तित्व यह सिद्ध करते हैं कि सिद्धांतों पर टिके रहना ही किसी कार्यकर्ता की सबसे बड़ी पहचान होती है। उन्होंने कभी पद की अपेक्षा नहीं की, कभी लाभ की राजनीति नहीं की, बल्कि संगठन को ही अपना परिवार और विचारधारा को अपना धर्म माना।

 

आज उनके जाने के बाद एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने खड़ा होता है-क्या आने वाली पीढ़ियाँ उनके इस समर्पण, संघर्ष और वैचारिक विरासत को आगे बढ़ा पाएँगी? क्या उनके आदर्श केवल स्मृतियों तक सीमित रह जाएँगे, या फिर उनके जीवन से प्रेरणा लेकर कोई नई पीढ़ी उसी निष्ठा और समर्पण के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा का मार्ग चुनेगी?

स्वर्गीय परमा नन्द तिवारी का जीवन हमें यह सिखाता है कि व्यक्ति नश्वर है, किंतु उसके आदर्श, उसका संघर्ष और उसका चरित्र अमर रहते हैं। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनकी सादगी, ईमानदारी, संगठन के प्रति समर्पण और विचारों की दृढ़ता सदैव स्मरणीय रहेगी।

 

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा समस्त परिवार को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति दें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

चन्दौली से~ सिटी चीफ़ तारकेश्वर पाण्डेय की रिपोर्ट

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