Saturday, October 17, 2026

हर इक ग़म भुलाना है सोचा है मैंने

हर इक ग़म भुलाना है सोचा है मैंने
बस अब मुस्कुराना है सोचा है मैने
इजाज़त अगर हो तो इक बात कह दूँ
तेरे दिल में आना है सोचा है मैने
ज़माने से वीरान है दिल की बस्ती
इसे फिर बसाना है सोचा है मैने
जो वादा कभी मैं ने तुम से किया था
उसे अब निभाना है सोचा है मैने
ग़ज़ल , शेर, मिसरे , तुम्हीं सब हमारे
तुम्हें गुनगुनाना है सोचा है मैने
उजड़ सी गयी है जो चाहत की दुनिया
उसे फिर सजाना है सोचा है मैंने
दयार-ए-मोहब्बत में मैं आगई हूं
कहीं अब न जाना है सोचा है मैने

डा० नसीमा निशा

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