Friday, August 21, 2026
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90 के दशक में इंडियाज मोस्ट वांटेड में एक था श्री प्रकाश शुक्ला  खौफ लोगों में इतना था कि नाम सुनते ही लोगों के पसीने छूट जाते थे, जानिए श्री प्रकाश शुक्ला की पूरी कहानी

90 के दशक में इंडियाज मोस्ट वांटेड में एक था श्री प्रकाश शुक्ला  खौफ लोगों में इतना था कि नाम सुनते ही लोगों के पसीने छूट जाते थे, श्री प्रकाश शुक्ला ने उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी और इसका खामियाजा उसे इस कदर भुगतना पड़ा  अपनी जान गंवानी पड़ी पढ़िए श्री प्रकाश शुक्ला के बारे में पूरी खबर

श्रीप्रकाश शुक्ला: एक साधारण सा लड़का कैसे बन गया था इंडियाज मोस्ट वांटेड

श्रीप्रकाश शुक्‍ला! 90 के दशक में अपराध की दुनिया में एक ऐसा नाम का 25-26 साल का शार्प-शूटर और ‘सुपारी किलर’ श्रीप्रकाश शुक्ला से पुलिस के साथ अपराधी भी खौफ खाते थे. श्रीप्रकाश और उसके पास मौजूद एके-47 दहशत का दूसरा नाम था. इस माफिया को पकड़ने के लिए ही यूपी में एसटीएफ का गठन हुआ था. एसटीएफ को भी माफिया को अंजाम तक पहुंचाने के लिए नाको चने चबाने पड़े थे.

श्रीप्रकाश शुक्ला मात्र 5 साल के अंदर एक के बाद एक वारदात को अंजाम देकर नंबर वन बदमाश बन गया था. शुक्ला को ‘जिगरवाला बदमाश’ माना जाता था. श्रीप्रकाश शुक्ला की आम पहलवान से बदमाश बनने तक का सफर किसी हिन्दी फिल्म की कहानी से कम नहीं है.

*20 साल की उम्र में किया था पहला मर्डर*

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के ममखोर गांव में हुआ था. उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे. वह अपने गांव का मशहूर पहलवान हुआ करता था. साल 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपनी बहन को देखकर सीटी बजाने वाले राकेश तिवारी नामक एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी. 20 साल के युवक श्रीप्रकाश के जीवन का यह पहला जुर्म था. ऐसा कहा जाता है कि इस मर्डर के बाद वह बैंकॉक भाग गया था. लेकिन, पैसे की तंगी के चलते वह ज्यादा दिन वहां नहीं रह सका और भारत लौट आया. देश आने के बाद उसने मोकामा (बिहार) का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया.

वर्ष 1997 में लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेन्द्र शाही की श्रीप्रकाश शुक्ला ने हत्या कर दी थी. माना जाता है कि शाही के विरोधी हरिशकंर तिवारी के इशारे पर उसने यह किया था. वह चिल्लुपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता था. इसके बाद तो यूपी में श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक कायम हो गया.

*1998 में दी सबसे बड़ी वारदात को अंजाम*

श्रीप्रकाश शुक्ला को खौफ की दुनिया में असली शौहरत बिहार के मंत्री हत्याकांड से मिली. श्रीप्रकाश शुक्ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था. श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ लाल बत्ती कार में आया और एके-47 राइफल से हत्याकांड को अंजाम देकर फरार हो गया था.

*श्रीप्रकाश शुक्ला को पकड़ने के लिए बनी थी STF*

श्रीप्रकाश के जब ताबड़तोड़ अपराध से सरकार और पुलिस के लिए सिरदर्द गए तो उसके खात्मे का मन बना लिया था. लखनऊ सचिवालय में यूपी के मुख्‍यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक बैठक हुई. इसमें अपराधियों से निपटने के लिए स्‍पेशल फोर्स बनाने की योजना तैयार हुई. 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्‍कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई. इस फोर्स का पहला टास्क था श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा.

*यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह मुख्यमंत्री को मारने की ली थी सुपारी*

श्रीप्रकाश ने यूपी पुलिस की नींद तो तब उड़ा दी जब, उसने उस समय सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (अब राजस्थान के राज्यपाल) की हत्या का सुपारी (ठेका) ली थी. 5 करोड़ में सीएम की हत्या का सौदा तय हुआ था. इसी के साथ गोरखपुर का नौसिखिया शार्प-शूटर देश का ‘करोड़पति सुपारी-किलर’ और यूपी पुलिस के लिए ‘चुनौती’ बन गया.

*1997 में हुई पहली मुठभेड़*

श्रीप्रकाश शुक्ला से पुलिस की पहली मुठभेड़ 9 सितम्बर 1997 को लखनऊ के जनपथ मार्केट में हुई थी. इस मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया था. इसमें एक सिपाही भी शहीद हो गया था.

श्रीप्रकाश शुक्ला की एक गर्लफ्रेंड भी थी जो दिल्ली में रहती थी. श्रीप्रकाश शुक्ला उससे बात करता था. एसटीएफ को इस बात की जानकारी हो गई थी और उसने उसकी गर्लफ्रेंड का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगाया था. इस बात की भनक श्रीप्रकाश को लग गई थी, लेकिन उसके बावजूद प्रेमिका से बात करने के लालच में वह पीसीओ से फोन करता था.

*ऐसे मारा गया था श्रीप्रकाश शुक्ला*

23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को मिली कि श्रीप्रकाश शुक्‍ला दिल्‍ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है. श्रीप्रकाश शुक्‍ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है. उस वक्‍त श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ कि STF उसका पीछा कर रही है. उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया. श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश शुक्ला मारा गया. इस तरह जुर्म के इस बादशाह की कहानी खत्म हुई. श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद उसका खौफ भले खत्म हो गया था लेकिन जयराम की दुनिया में उसके आज भी चर्चे होते हैं.

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