Saturday, October 17, 2026

जैसा तुमने चाहा था

जैसा तुमने चाहा था

अपने हाथों की लकीरों से डर लगता है ।
आने वाले दिनों मे उसकी बेवफाई से दर लगता है ।
मेरी भी पलकों पर ख़्वाबों का आशियाँ है,
ये और बात है ,होठों पर लाने से डर लगता है।

खुद को मुझसे कितना भी दूर कर लो।
साया हूँ साथ देती रहूँगी ।
रिश्तो का भरम और मर्म तुम क्या जानो।
वफ़ा और ज़फा का फ़र्क बताती रहूंगी।

तुम्हारे प्यार ने इतना तो हक़ दे ही दिया है मुझे,
तुम्हारे दर्द को महसूस करूँ बिना शब्दों के।
कुछ शब्द भी हैं बोझिल ,कुछ अर्थ भी है रूठे।
लेकिन ,यकीन मानों, मै बिल्कुल वैसी ही हूँ जैसा तुमने चाहा था।

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