भारत में जातिगत राजनीति के दुष्प्रभाव
काली शंकर उपाध्याय की कलम से
जाति, जो कभी पहचान थी, आज राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बन गई है। जिस भारत को हमने “विविधता में एकता” का नाम दिया था, उसी भारत को जातिगत राजनीति ने “विविधता में दरार” बना दिया है।
1. योग्यता का गला घोंट दिया
जब चुनाव में टिकट जाति देखकर बाँटे जाएँगे, तो प्रतिभा कहाँ जाएगी? इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक – सबकी भर्ती में पहले जाति पूछी जाती है, योग्यता बाद में। नतीजा ये है कि कुर्सी पर वो बैठा है जिसे काम नहीं आता, और जिसे काम आता है वो कुर्सी के बाहर खड़ा है। देश का नुकसान किसका हुआ? सिर्फ हमारा।
2. समाज को टुकड़ों में बाँट दिया
पहले गाँव में त्योहार सब मिलकर मनाते थे। होली में रंग, दीवाली में दिए – कोई नहीं पूछता था कौन किस जाति का है। आज नेता आता है और कहता है – “तुम ब्राह्मण हो, तुम्हारा वोट मेरा”, “तुम दलित हो, तुम्हारा मसीहा मैं”। भाई को भाई से लड़वा दिया। एक ही खेत में काम करने वाले मजदूर अब एक-दूसरे को शक की नजर से देखते हैं। ये जहर किसने घोला? जातिगत राजनीति ने।
3. विकास की जगह विनाश*
जहाँ सड़क चाहिए थी वहाँ जाति का बोर्ड लग गया। जहाँ स्कूल चाहिए था वहाँ जाति का छात्रावास बन गया। बजट का पैसा योजनाओं में नहीं, जातिगत समीकरण साधने में खर्च हो रहा है। पुल इसलिए नहीं बनता कि लोगों को जरूरत है, बल्कि इसलिए बनता है कि ठेकेदार किस जाति का है।
*4. नफरत की खेती*
सबसे बड़ा दुष्प्रभाव ये है कि नई पीढ़ी के दिमाग में जहर भरा जा रहा है। बच्चा जब स्कूल जाता है तो किताब से पहले उसे सिखाया जाता है कि “तुम्हारे दुश्मन कौन हैं”। कॉलेज में एडमिशन के वक्त दोस्त नहीं, जाति देखी जाती है। नौकरी में इंटरव्यू से पहले सरनेम देखा जाता है। हमने अपने बच्चों को क्या दे दिया – भविष्य या भेदभाव?
5. लोकतंत्र कमजोर हुआ
लोकतंत्र का मतलब था “जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा”। जातिगत राजनीति ने इसे बना दिया “जाति का, जाति के लिए, जाति द्वारा”। मुद्दे गायब हो गए, मेनिफेस्टो की जगह जातिगत घोषणा-पत्र आ गए। नेता पूछता है “तुम कितने हो”, नहीं पूछता “तुम्हें चाहिए क्या”।
अब सवाल ये है – इलाज क्या है?
इलाज मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं। पहला, हम वोट देते वक्त उम्मीदवार की जाति नहीं, नियत देखें। दूसरा, अपने बच्चों को सिखाएँ कि इंसान की पहचान उसके कर्म से होती है, जाति से नहीं। तीसरा, जो नेता जाति के नाम पर वोट माँगे, उसे सबक सिखाएँ।
मैं काली शंकर उपाध्याय, एक अदना सा भारतीय, इतना ही कहूँगा – जाति प्रथा हजार साल पुरानी बीमारी है, पर जातिगत राजनीति कैंसर है। बीमारी का इलाज होता है, कैंसर जान ले लेता है।
अगर आज नहीं जागे, तो कल हमारे पास न देश बचेगा, न समाज। सिर्फ जातियाँ बचेंगी, और जातियों का देश नहीं होता, कब्रिस्तान होता है।







