Friday, August 21, 2026
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राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के पावन अवसर पर, वाराणसी और भोजपुरी के अटूट रिश्ते पर एक विशेष लेख

राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के पावन अवसर पर, वाराणसी और भोजपुरी के अटूट रिश्ते पर एक विशेष लेख

 

मातृभाषा: बनारस की आत्मा और हमारी पहचान

बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, एक जीवंत परंपरा है, और इस परंपरा की धड़कन यहाँ की मातृभाषा ‘भोजपुरी’ है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर जब हम अपनी जड़ों की बात करते हैं, तो काशी की गलियों में गूँजती वह मिठास और अपनापन याद आता है जो हमें दुनिया की किसी और भाषा में नहीं मिल सकता।

वाराणसी के व्यक्तित्व में मातृभाषा की भूमिका:

अपनत्व का सेतु: बनारस में मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने वाला पुल है। यहाँ के ‘अस्सी’ से लेकर ‘दशाश्वमेध’ तक, जब कोई “का गुरु, का हाल बा?” पूछता है, तो उसमें जो आत्मीयता होती है, वह किताबी भाषा में ढूँढना मुश्किल है।

संस्कृति की संवाहक: हमारी लोक कलाएँ, चैती, कजरी और बिरहा—ये सब मातृभाषा की गोद में ही पले-बढ़े हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से लेकर बिस्मिल्लाह खान तक, हर दिग्गज ने अपनी मिट्टी की बोली से ऊर्जा पाई है।

बौद्धिक और व्यावहारिक संगम: वाराणसी एक ऐसा केंद्र है जहाँ एक ओर संस्कृत की विद्वत्ता है, तो दूसरी ओर भोजपुरी की सरलता। यहाँ का आम जनमानस अपनी मातृभाषा में ही अपने सुख-दुख साझा करता है, जो उसे अपनी जड़ों से मजबूती से जोड़े रखता है।

निष्कर्ष

मातृभाषा वह पहली लोरी है जो हमने सुनी और वह पहला शब्द है जिसे हमने समझा। वाराणसी की मिट्टी और यहाँ की बोली हमें यह सिखाती है कि हम चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ या कितनी भी भाषाएँ सीख लें, लेकिन जो सुकून ‘अपनी बोली’ में मिलता है, वह अनमोल है |

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