Friday, August 29, 2025

आज़ मन दुखी है। कारण आज वरिष्ठ पत्रकार मार्कण्डेय सिंह,

अपनी बात…
आज़ मन दुखी है। कारण आज वरिष्ठ पत्रकार मार्कण्डेय सिंह, अमर उजाला के अजय शंकर तिवारी जी के अलावा आज़ तक टीवी न्यूज एंकर रोहित सरदाना जी अब हमारे बीच नहीं रहे। मार्कण्डेय सिंह जी के अलावा दोनों ही वरिष्ठ पत्रकार कोरोना महामारी की गिरफ्त में आ कर मृत्यु को प्राप्त हुए। कोरोना महामारी की दूसरी लहर सबसे भयावह है। आज हर तरफ मौत ही मौत। कहीं सिस्टम, सरकार जिम्मेदार है तो कहीं जनता स्वयं। आज़ स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, खामियों पर प्रश्न चिह्न लगाने वाले देशद्रोही करार दिए जाने लगे। स्थिति ऐसी बनी है कि निंदक नियरे रहने की बजाए खुद ही कोरेंटाइन हो गये। फिर भी सोशल मीडिया पर कुछेक ऐसे भी वीर पड़े हैं जो सरकार को समय समय पर कोसते हुए सिस्टम की कमी, खामियों को उजागर कर रहे हैं। सरकारी तंत्र जनहित और लोगों के जीवन से जुड़ी कमियों को दूर करते हुए उसमें सुधार करने की बजाय लोगों के मुंह बंद करने में अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने लगी।
एक तरफ मीडिया जगत से जुड़े लोगों को खो देने की पीड़ा वहीं दूसरी ओर शीर्ष अदालत का एक अहम फैसला जिसने देश की जनता को इस बात की स्वतंत्रता में आने वाली अड़चन के पर कतर दिए कि वह ऐसी खबरें सोशल मीडिया पर वायरल या पोस्ट नहीं करेंगे जो सरकार की खामियों को उजागर कर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने सरकार और पुलिस को साफ तौर पर यह अहम आदेश देते हुए कहा है कि सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन, बेड, दवाओं आदि की पोस्ट करने वालों पर कार्रवाई नहीं होगी. कोई भी सरकार किसी नागरिक द्वारा सोशल मीडिया पर डाली जानकारी पर कार्रवाई नहीं करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों व डीजीपी को आदेश देते हुए कहा है कि अगर अफवाह फैलाने के नाम पर कार्यवाही की तो अवमानना का मामला चलाएंगे। SC ने कहा कि हमने देश के विभिन्न मामलों के विभिन्न मुद्दों की पहचान की हैऔर हमारी सुनवाई का उद्देश्य राष्ट्रीय हित के मुद्दों की पहचान करना और संवाद की समीक्षा करना है. इसे फैसला करने वालों के लिए विचार के लिए किया जा रहा है। शीर्ष अदालत का यह आदेश सराहनीय है जिसका स्वागत किया जा रहा है।
Covid-19 अथवा किसी अन्य कारणों से मीडिया कर्मियों की मृत्यु दुखद है। आज छोटे बड़े पत्रकारों की समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी निर्वहन करते हुए असमय काल के गाल में समा जाना चिंताजनक है। मीडिया कर्मी अपने पेशे से इमानदारी करते हुए मृत्यु को गले लगा रहा है जिसके लिए हम सिर्फ शोक संवेदना प्रकट करके अपनी जिम्मेदारी समाप्त कर रहे हैं। आज़ जब जनता अपने घरों में सुरक्षित होती है ऐसे समय में भी मीडिया कर्मी सिस्टम के साथ मिलकर अपना दायित्व निभा रहा है। लेकिन उसे शोक संवेदना के अलावा और कुछ भी मिलने वाला नहीं है। समाज और सरकार सभी उसके योगदान को भूला देते हैं। यह चिंता का विषय है। पत्रकार समाज का हिस्सा है उसके पीछे लोगों को सांत्वना के साथ ही सहयोग की भी जरूरत होती है। वह दिन रात अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है ताकि समाज की बातें लोगों तक पहुंचे इसके लिए लोगों को भी उसके और उसके परिवार के बारे में सोचना चाहिए। फ्रंटलाइन के पत्रकारों के परिवार को मददगार बहुत मिलते हैं लेकिन उनके पीछे खड़े पत्रकारों को कोई पूछने वाला नहीं है। यहां तक कि वह पत्रकार जिस संस्थान के लिए काम करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है वह संस्थान भी उसे अपना नहीं मानता है। कुछ मीडिया संस्थान एक ऐसी सहयोग राशि देकर उस परिवार पर एहसान रूपी बोझ डाल अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। पत्रकारों को इस दिशा में आत्ममंथन करना चाहिए कि समाज, सरकार उनके लिए कितनी सहयोगी है। मीडिया संगठनों को इस विषय पर सरकार से अपने हक़ और परिवार के भविष्य को लेकर चर्चा करनी चाहिए तथा एक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए कि दूसरे पायदान पर खड़े पत्रकारों को एक बेहतरीन पैकेज मिल सके जिससे उनके बाद उनके परिवार को समाज में मजबूती से खड़े होने का बल मिले। सरकार को भी पत्रकारों के हितों और उनके बाद उनके परिवार के भविष्य को लेकर एक योजना बनाई जानी चाहिए।
कुछ कानून और नियम पत्रकारों के लिए बनाए गए हैं जो पूरी तरह से पूंजीवादी व्यवस्था की भेंट चढ़ गए और वह सिर्फ फाईलों की शोभा बने हुए दम तोड़ रहे हैं।
चिन्तन और मंथन करने की जरूरत है।

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