पेपर चेकिंग की आड़ में आम नागरिक का शोषण – मिर्जापुर के जमालपुर में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल
मिर्जापुर जनपद के जमालपुर क्षेत्र में हाल ही में एक घटना ने स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, अगर वही कंधे मनमानी पर उतर आएं, तो नागरिकों के लिए न्याय और सुरक्षा केवल एक भ्रम बनकर रह जाते हैं।
एक वाहन चालक ने आरोप लगाया है कि उसे “कागज़ात जांच” के नाम पर रोका गया,कागजात ठिक पाए जाने पर बोला गया कि सब ठीक है आप जा सकते है
लेकिन जब गाड़ी पूरी तरह से रुक गई और उसने स्वाभाविक रूप से सीट बेल्ट हटाई, और गाड़ी से बाहर निकले, उसी पल पुलिस ने उसका चालान “सीट बेल्ट न पहनने” के आरोप में काट दिया।
10 महीने बाद सीट बेल्ट पर चलान काटे जाने का मैसेज आया जो कि ये गलत है अगर कोई कमी थी तो उसी वक़्त क्यों नही बताया गया और चलान की सूचना 10 महीने बाद क्यों मिली ।
यह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है – क्या अब कानून का पालन करना भी लोगों के लिए जाल बनता जा रहा है?
यह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि पूरी तरह से गलत और न्याय के विरुद्ध है। सवाल उठता है कि जब वाहन चल ही नहीं रहा था, तब सीट बेल्ट लगाने की अनिवार्यता क्यों और कैसे लागू हो सकती है?
क्या यही है ट्रैफिक सुरक्षा का सही प्रयोग?
भारत में ट्रैफिक नियमों का पालन जरूरी है, और हर नागरिक को इसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन यदि इन नियमों को राजस्व वसूली का जरिया बना दिया जाए, और नागरिकों को चालान के जाल में फंसाया जाए, तो यह एक तरह की प्रशासनिक गड़बड़ी है।
पुलिस को अधिकार है नियम लागू करने का, लेकिन मनमानी करने का नहीं। जिस तरह से पेपर चेकिंग के नाम पर चालान काटे जा रहे हैं, वह कानून का पालन नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग है।
नागरिकों की भूमिका और आवाज उठाने की ज़रूरत
दुख की बात यह है कि अधिकांश नागरिक ऐसे मामलों में चुप रह जाते हैं। डर, थकावट या ‘क्या फर्क पड़ेगा’ की भावना के कारण लोग गलत चालान भी स्वीकार कर लेते हैं।
लेकिन अब समय आ गया है कि:
लोग ऑनलाइन शिकायत पोर्टल के माध्यम से अपनी बात रखें।
जरूरत हो तो RTI के ज़रिए चालान की पूरी प्रक्रिया और फुटेज की जानकारी मांगी जाए।
संगठित तरीके से स्थानीय प्रतिनिधियों और मीडिया से संपर्क कर इस विषय को उठाया जाए।
पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी
यदि कुछ अधिकारी ऐसे फर्जी चालान काट रहे हैं, तो इसका असर पूरे विभाग की छवि पर पड़ता है। वरिष्ठ अधिकारियों को चाहिए कि वे:
मामले की जांच कराएं
दोषियों पर कार्रवाई करें
और चालान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए तकनीकी माध्यमों (जैसे बॉडी कैमरा, CCTV रिकॉर्डिंग) को अनिवार्य करें।
जमालपुर, मिर्जापुर की यह घटना हमें याद दिलाती है कि यदि कानून के रखवाले ही नियमों को हथियार बना लें, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। अब जरूरी हो गया है कि जनता अपने अधिकारों के लिए जागरूक बने और शांतिपूर्ण, कानूनी तरीकों से ऐसे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाए।
नियम सबके लिए हैं — और नियमों के नाम पर अन्याय किसी के लिए नहीं।
चंदौली से पीयूष मिश्रा की एक रिपोर्ट