मानव, मानव से घृणा करने लगा
समय की पुकार
ऐसी आँधी चली, हवा दूषित हुई।
तन दूषित हुआ, मन भी दूषित हुआ।
सब कुछ नष्ट होने लगा।
मानव, मानव से घृणा करने लगा।
मानों पृथ्वी पर पाप बढ़ने लगा।
अपनों ने अपनों को खोते देखा।
आँखें देखती रही, आंसू बहाती रही।
मन व्याकुल हुआ, तन व्याकुल हुआ।
अपनों ने अपनों को ढूंढा पर कोई सहारा ना मिला।
अकेले संघर्ष करता रहा, जीवन जीता रहा।
पर मनुष्य डरा नहीं, पाप करता रहा।
मानव, मानव से घृणा करता रहा।
मानों पृथ्वी पर पाप बढ़ने लगा।
हम बड़े हैं, हम ही बड़े हैं। खुद को कहता रहा।
पर, एक दिन छोड़ जाना है, यह है दुनिया की रीत,
तब क्यों बनाते हो मानव, मानव के बीच लकीर।
क्यों बनायें पक्की दीवारों की भीत।
चलो अब भी दो कदम साथ चलें।
मानव हो, मानव के किसी काम आएं।
क्या कुछ सीखे हो आप,
इस महामारी से लड़ने में।
यदि उससे कुछ सीख लें, आगे हम चलें।
नहीं रह जाएगी, सबसे बड़ी लाचारी।
मानव की मानव से घृणा की होगी भरपाई।
नोट :- यह समय की पुकार पर आधारित रचना है।
लेखक :- गौतम विश्वकर्मा
(संस्थापक/राष्ट्रीय अध्यक्ष)
सोनभद्र मानव सेवा आश्रम (ट्रस्ट)