30मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर प्रसंगवश विश्वसनीयता संकट के दौर मे उम्मींद की किरण है प्रिंट मीडिया- राजीव कुमार ओझा
रावर्ट्सगंज (सोनभद्र)
देवर्षि नारद की वाचिक पत्रकारिता से पत्रकारिता का आरंभ माना जाता है।तकरीबन 250 वर्षों का भारतीय पत्रकारिता का इतिहास पत्रकारिता के क्रमिक विकास, पतन,दमन की अनगिनत कही, अनकही कहानियों को अपने गर्भ मे समेटे हुए है।गुलाम भारत मे पत्रकारिता के समक्ष देश को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने का चुनौती भरा लक्ष्य था।तत्कालीन मिशनरी पत्रकारिता ने सत्ता के दमन चक्र से डरे बिना पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास रचा।
स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम दस्ते मे शामिल महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू,बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, पंडित बाबू राव विष्णु पराड़कर, सैय्यद अब्दुल्ला बरेलवी,गणेश शंकर विद्यार्थी, पांडेय बेचन शर्मा उग्र,एस.सदानंद आदि ने जनमत कायम करने,देश की आजादी के मिशन से अवाम को जोड़ने के लिये अखबारों का प्रकाशन किया,अखबारों से जुड़े ।
आजाद भारत की बुनियाद मे कलमकारों, पत्रकारों की अहम भूमिका रही है,आजादी की जंग मे कलमकारों, पत्रकारों ने सत्ता का दमन झेला,जेल की यातना झेली और फांसी के फंदे पर भी झूले।
सत्ता का चरित्र विरोध की आवाज का गला घोंटने का होता है। बंगाल गजट गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ लिखता था ।इसके संपादक जेम्स आगस्ट हिकी को जेल की यातना झेलनी पड़ी और भारत से निष्कासन की सजा भी झेलनी पड़ी।ऐसे अनगिनत मामले इतिहास मे दर्ज हैं।
आजादी के बाद अंग्रेजों द्वारा लुटे पिटे भारत के नव निर्माण का चुनौती भरा दायित्व पत्रकारिता की पृष्ठभूमि के पंडित जवाहर लाल नेहरू के कंधों पर आया।आजाद भारत के नव निर्माण मे पंडित जवाहर लाल नेहरू के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।आजाद भारत के शुरुआती काल खंड मे प्रिंट मीडिया मे अमूमन स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े या उनके आदर्शों से प्रेरित लोगों ने समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया,तब की मीडिया पूंजीपतियों के प्रभाव से मुक्त थी।कालांतर मे प्रिंट मीडिया के विस्तार के साथ पूंजी की भूमिका बढने लगी।
नेहरू जी प्रेस की आजादी ,पत्रकारिता की लोक कल्याणकारी भूमिका के पक्षधर थे ।नेहरू ने कहा था
” मैं उम्मीद करता हूं कि हिन्दुस्तान मे उन खबरों को दबाने की प्रवृत्ति नहीं बढ़ेगी जिन्हें निहित स्वार्थी पसंद नहीं करते।”
देश ने इंदिरा गांधी के शासनकाल मे आपातकाल मे प्रेस के दमन का शर्मनाक दौर भी देखा।आपातकाल के विषम दौर मे भी प्रिंट मीडिया ने अपना जमीर, अपना अस्तित्व बचाए रखा।
तकनीकी दृष्टि से पत्रकारिता की समृद्धि अपने साथ पत्रकारिता के पतन का वायरस ले आई।मीडिया के मौजूदा चाल चरित्र, चेहरे ने उसे आम आदमी से दूर किया है,उसके भरोसे को तोड़ा है। लोकतंत्र का यह वाचिक चतुर्थ स्तंभ अब आम आदमी की आवाज का प्रतिनिधित्व करने की पहचान खोने लगा है। चंद अपवादों को छोड़ दें तब मीडिया सत्ता के प्रवक्ता की शर्मनाक भूमिका मे खड़ी है। पेड न्यूज का फोड़ा अब पेड मीडिया घरानों ,पेड टीवी चैनलों की शक्ल मे नासूर बन गया है।
केन्द्रीय सियासत मे नरेन्द्र मोदी के प्रवेश के बाद मीडिया का जैसा शर्मनाक चेहरा सामने आया वह पत्रकारिता की खाल ओढ़ कर पक्षकारिता करने वाला चेहरा है।मीडिया फील्ड मे कारपोरेट घरानों के बढ़ते वर्चस्व का नतीजा है कि आज अधिकांश चैनलों पर इन कारपोरेट घरानों का कब्जा है ।चैनलों ने नरेन्द्र मोदी की पीआर एजेन्सी के रूप मे काम करना शुरू किया।नरेन्द्र मोदी की अवतारी पुरुष की छवि गढ़ने और कांग्रेस सहित गैर भाजपा दलों, उनके नेताओं की छवि धूमिल करने की टीवी चैनलों की शर्मनाक भूमिका देश ने देखी है,देख रहा है।
मीडिया का जो खतरनाक चेहरा देश देख रहा है उसकी कल्पना पत्रकारिता के भीष्म पितामह बाबू राव विष्णु पराड़कर जी ने 1925 मे ही की थी।वृंदावन मे हुए संपादकों के प्रथम सम्मेलन मे पराड़कर जी ने कहा था कि पत्रकारिता का आनेवाला कल संपादकीय सत्ता को कमजोर और प्रबंधकीय सत्ता को मजबूत करने बाला होगा।संपादकीय सत्ता को प्रबंधकीय सत्ता संचालित करेगी।
1925 मे पराड़कर जी ने आने बाले कल की पत्रकारिता के संदर्भ मे जो कहा था वह आज की पत्रकारिता का भयावह सच है।आज खबरें गढ़ी जाती हैं।वाहियात मुद्दों पर टीवी चैनलों पर डिबेट की जाती है। 2019 मे आफिशियल पीईंग ह्यूमन ने चार प्रमुख टीवी चैनलों की 200 डिबेट का अध्ययन किया और पाया कि भारत-पाकिस्तान पर केन्द्रित 79,मोदी,भाजपा और आरएसएस की विरदावली पर केन्द्रित 36, विपक्ष और उसके नेताओं के चरित्र हनन पर केन्द्रित 66, राम मंदिर पर केन्द्रित 14,चंद्रयान मिशन पर केन्द्रित 2,बिहार की बाढ़ विभीषिका पर केन्द्रित 3,पीएमसी बैंक घोटाले और भाजपा सरकार मे गृह राज्य मंत्री रहे।
स्वामी चिन्मयानंद द्वारा एक ला स्टूडेंट के शर्मनाक यौन उत्पीड़न पर केन्द्रित मात्र 1-1 डिबेट हुयी।। दंगल,मुकाबला, टक्कर ,पूछता है भारत जैसे शीर्षकों से होने वाली इन डिवेट्स मे चीखते चिल्लाते एंकरों की मौजूदगी मे टीवी स्टूडियो मे डिबेट के प्रतिभागियों मे गाली गलौज, मारपीट की शर्मनाक घटनाओं, आज तक की एक डिबेट के दौरान भाजपा के बदजुबान और बदतमीज़ प्रवक्ता संवित पात्रा द्वारा कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी पर की गयी अभद्र टिप्पणी से गंभीर तनाव के शिकार हुए श्री त्यागी की मौत के नजारों को याद करें तो मीडिया की खाल ओढ़ कर पत्रकारिता को कलंकित करते इन टीवी एंकरों को पत्रकार कहना इस पवित्र पेशे का अपमान करना होगा।इन डिवेट्स का लक्ष्य मंहगाई, भ्रष्टाचार, रोजी- रोजगार,रिकार्ड तोड़ घपले-घोटालों, देश की सीमाओं के सच ,तबाह अर्थव्यवस्था,देश के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को चंद कारपोरेट घरानों के हांथ औने पौने दामों पर बेचने,संवैधानिक संस्थाओं के शर्मनाक दुरूपयोग जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना होता है।
इन चैनलों ने भगवा सांप्रदायिक एजेंडा को प्रमोट कर उन्मादी युवाओं का भीड़ तंत्र देश पर थोपने का अपराध किया है, इस उन्मादी भीड़ ने माब लींचिंग की तमाम वारदातें की, जिसके शिकार उत्तर प्रदेश के पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध भी हुए।सत्ता और भगवा खेमे के इशारे पर राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा दंगाई चैनलों ने गढ़ी जो सत्ता से सबाल करने वालों को देशद्रोही बताने लगी।मोदी और मोदी सरकार से सबाल करना देश को बदनाम करना है यह बताया जाने लगा,बताया जा रहा है।
मीडिया के इस नए अवतार ने मीडिया की विश्वसनीयता को वेंटिलेटर पर पहूंचा दिया है ।आम आदमी यह कहने लगा है कि सारी मीडिया बिक गयी है।
सारे पत्रकार सरकार की दलाली कर रहे हैं। मीडिया के चेहरे पर पुती इस कालिख का नतीजा है
कि आज सोशलमीडिया,पब्लिक जर्नलिज्म उस शून्य को पाट रहा है जो मीडिया के इस नए अवतार की काली करतूतों ने पैदा किया है।गनीमत है कि विश्वसनीयता की कसौटी पर आज भी प्रिंट मीडिया ने अपनी पहचान काफी हद तक बचा कर रखी है,आम आदमी आज भी अपनी आवाज सड़ांध मारती व्यवस्था तक पहुंचाये जाने की उम्मीद प्रिंट मीडिया से ही करता है।
गौर तलब है कि प्रिंट मीडिया का भी कार्पोरेटीकरण होने की वजह से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस एंटी जर्नलिज्म वायरस से संक्रमित है उसका संक्रमण प्रिंट मीडिया को भी अपना शिकार बना रहा है।इस वायरस ने सर्वाधिक नुकसान प्रिंट मीडिया का किया है यह बात प्रिंट मीडिया को समझनी होगी।इलेक्ट्रानिक मीडिया की करतूतों को बेनकाब करने, मीडिया को विश्वसनीयता के संकट से उबारने की चुनौती प्रिंट मीडिया को स्वीकार करनी होगी और इस देश को यह भरोसा देना होगा कि वह लोकतंत्र की रक्षा करने,आम आदमी की आवाज बनने के अपने पत्रकारिता धर्म के निर्बहन के लिये कृत संकल्पित है।
TTM news se Anand Prakash Tiwari ki report