प्रहलाद जायसवाल का अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र स्वीकार
अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी और राजकुमार तिवारी ने रखा पक्ष
जिला जज वाराणसी का आदेश इस प्रकार से है
यह प्रथम अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र प्रार्थी/अभियुक्त प्रहलाद जायसवाल की तरफ से उपरोक्त मामले में प्रस्तुत किया गया है। प्रार्थी / अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता एवं अभियोजन पक्ष की तरफ से विद्वान जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) के तर्कों को सुना तथा पत्रावली पर उपलब्ध सामग्री का
अवलोकन किया।
संक्षेप में अभियोजन कथानक इस प्रकार है कि प्रार्थी ने दिनांक 03.01.2014 को अपना मकान नं0-सी.5/32 तेलियाना थाना चेतगंज, जिला वाराणसी का बैनामा दीनदयाल श्रीवास्तव व विनय कुमार सिंह को किया था। उस बैनामे के समय मनीष आर्य 1,00,000/- रूपये का एक चेक प्रहलाद जायसवाल ने यह कहते हुए दिया था कि यह चेक कार्पोरेशन बैंक शाखा वाराणसी का है जो असली है। प्रार्थी ने जब उक्त चेक के बारे में पता किया तो पता चला कि वह फर्जी है। प्रहलाद जायसवाल ने प्रार्थी के साथ षडयन्त्र कर कूटरचित चेक दिया जिसका शिकायत जब प्रार्थी प्रहलाद जायसवाल से किया तो उसने एक स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया कि मैं दो माह के अन्दर आपका 1,00,000 (एक लाख) /- रुपये प्रदान कर दूँगा परन्तु वह भी चैक फर्जी होने के कारण आज तक प्रार्थी का पैसा नहीं मिल पाया है। प्रार्थी दिनांक 10.04.2015 को उससे माँगने गया तो वह मारपीट पर अमादा हो गया और जान से मारने की धमकी देने लगा और पैसा देने से इन्कार कर दिया। रिपोर्ट दर्ज कर उचित कार्यवाही करने की कृपा करें।
प्रार्थी/ अभियुक्त की ओर से उनके विद्वान अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी व राजकुमार तिवारी द्वारा तर्क प्रस्तुत किया गया है कि प्रार्थी/ अभियुक्त निर्दोष है। उसके द्वारा कोई अपराध कारित नहीं किया गया है। प्रार्थी/ अभियुक्त के खिलाफ माननीय न्यायालय में आरोप पत्र विवेचक द्वारा दाखिल किया गया है जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा गैर जमानतीय वारण्ट और धारा-82 सी०आर०पी०सी० जारी है। वास्तविक तथ्य यह है कि यादी मुकदमा मनीष आर्य द्वारा दिनांक 03.01.2014 को अपने मकान नं०-सी० 5/32, तेलियाना, थाना-चेतगंज, जिला-वाराणसी का बैनामा दीनदयाल श्रीवास्तव व विनय कुमार सिंह को किया जा रहा था, क्योंकि प्रार्थी/ अभियुक्त क्रेता व विक्रेता दोनों परिचित थे, इसलिए प्रार्थी / अभियुक्त क्रेतागण के निवेदन पर विक्रय विलेख तहरीर कराये जाने के समय रजिस्ट्री आफिस में मौजूद था। विक्रय पत्र तहरीर के समय क्रेतागण के पास एक लाख रुपया कम होने से क्रेतागण व विक्रेता के बीच मतभेद हो गया और विक्रेता वादी मुकदमा मनीष आर्य द्वारा विक्रय पत्र रजिस्ट्रेशन कराये जाने से साफ तौर पर इन्कार कर दिया गया तो क्रेतागण के निवेदन पर प्रार्थी/ अभियुक्त द्वारा विक्रेता वादी मुकदमा मनीष आर्य को यह आश्वासन दिया गया कि क्रेतागण अच्छे आदमी है और वे आपका पैसा जरूर अदा कर देगे। जिस पर वादी मुकदमा मनीष आर्य द्वारा प्रार्थी/अभियुक्त के जमानत पर विश्वास कर अपने मकान का विक्रय पत्र तहरीर करने पर रजामन्द हो गये। प्रार्थी/ अभियुक्त द्वारा वादी मुकदमा मनीष आर्य को 1,00,000/- (एक लाख) रूपया नगद अदा भी कर दिया गया है, जिसके बावत वादी मुकदमा मनीष आर्य द्वारा अवर न्यायालय में उपस्थित होकर यह बयान भी दिया है कि वादी मुकदमा को प्रार्थी/ अभियुक्त से कुल 1,00,000/- (एक लाख) रूपया प्राप्त हो गया है। प्रार्थी/ अभियुक्त द्वारा बादी मुकदमा को कोई धमकी भी नहीं दी गयी है। पार्थी/ अभियुक्त के पलायन करने की कोई सम्भावना नहीं है। प्रार्थी/ अभियुक्त को अग्रिम जमानत पर रिहा होने के पश्चात पलायन की कोई संभावना नहीं है। प्रार्थी / अभियुक्त अपना मुचलका देने के लिये तैयार
है। ऐसी स्थिति में प्रार्थी / अभियुक्त की अग्रिम जमानत स्वीकार किया जाना आवश्यक एवं न्यायसंगत है।
विद्वान जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) द्वारा उक्त प्रथम अग्रिम जमानत
प्रार्थनापत्र पर आपति करते हुए अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र का घोर विरोध किया गया और
प्रथम अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र निरस्त किये जाने पर बल दिया गया।
उभयपक्ष की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं के तर्कों को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया गया। पत्रावली के अवलोकन से दर्शित है कि प्रार्थी/अभियुक्त पर वादी मुकदमा के साथ धोखाधड़ी करने, जान से मारने की धमकी देते हुए विश्वास के आपराधिक भंग का अभियोग है। अभियुक्त जिस धारा के अंतर्गत वांछित है यह धारा- 419, 420, 406,506 भा0दं0सं0 है जिसमें अधिकतम देय सजा 7 वर्ष तक की है। अभियुक्त द्वारा अपने जमानत प्रार्थनापत्र में कथन किया गया है कि वादी मुकदमा द्वारा अवर न्यायालय में उपस्थित होकर बयान दिया है कि अभियुक्त द्वारा वादी मुकदमा को कुल 1,00,000/-रुपये वापस कर दिये गये हैं। न्यायालय को अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र पर पारित नजीर Satendra Kumar Antil Vs CBI 2023 Live Law (SC) 233 के प्रकाश में गुण- दोष पर इस स्तर पर विचार नहीं करना है अपितु यह देखना है कि क्या अभियुक्त को जेल भेजे जाने से कोई वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति होगी। अभियुक्त का कोई आपराधिक इतिहास भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।
अतः केस के तथ्यों एवं परिस्थितियों में गुणदोष पर कोई मत व्यक्त किये बिना अभियुक्त के जमानत का आधार पर्याप्त है, इसलिये प्रार्थी/अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत जमानत प्रार्थनापत्र स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
प्रार्थी/ अभियुक्त प्रहलाद जायसवाल द्वारा प्रस्तुत अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र स्वीकार किया जाता है। प्रार्थी/अभियुक्त द्वारा रुपया 50,000/- (पचास हजार रुपए) का व्यक्तिगत बंधपत्र व इतनी ही धनराशि के दो प्रतिभू प्रस्तुत किये जाने की दशा में उसे पुलिस द्वारा उक्त अपराध में गिरफ्तार करने की दशा में जमानत पर छोड़ दिया जाएगा।
प्रार्थी/ अभियुक्त इस आशय का भी अन्डरटेकिंग करेगा कि
1. प्रार्थी/ अभियुक्त स्वयं को पुलिस अधिकारी के समक्ष पूछताछ हेतु प्रस्तुत करेगा
जब भी ऐसा करना आवश्यक समझा जायेगा।
2. प्रार्थी/ अभियुक्त प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से कोई धमकी, वचन या लालच ऐसे व्यक्ति
को नहीं देगा जो प्रकरण के तथ्यों से मिज हो जिससे कि उसे न्यायालय के समक्ष या पुलिस
अधिकारियों के समक्ष सही तथ्यों को प्रकट करने से हतोत्साहित किया जा सके।
3. प्रार्थी/ अभियुक्त भारत देश नहीं छोड़ेगा जब तक कि सक्षम न्यायालय की स्वीकृति
प्राप्त न कर ली गयी हाँ। प्रार्थी/ अभियुक्त द्वारा उक्त शर्तों का उल्लंघन किए जाने पर अभियोजन दं०प्र०सं० के प्राविधानों के अन्तर्गत अग्रिम जमानत निरस्त कराने का अधिकारी होगा।