Friday, August 21, 2026

जिस तरफ़ जाए तेरी नज़र

“जिस तरफ़ जाए तेरी नज़र”

 

 

याद हर इक उभर जाती है,

जब ख़ुमारी उतर जाती है।

 

हर अदा कातिलाना तेरी,

क़त्ल कर के मुकर जाती है।

 

जब तू गुज़रे मेरी रहगुज़र,

रंग फ़िज़ाओं में भर जाती है।

 

सुन के बातें तेरी सरगमी,

मौशिक़ी भी संवर जाती है

 

हैं तुम्हारी जो अंगड़ाइयां,

वार मुझ पे ही कर जाती हैं।

 

गेसुओं को तेरे देख कर,

ये घटा भी लहर जाती है।

 

जिस तरफ़ जाए तेरी नज़र,

ये तबीयत उधर जाती है।….

 

 

स्वरचित एवं मौलिक…….

 

मधुलिका राय “मल्लिका”

 

गाजीपुर

उत्तर प्रदेश

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