- कोरोना काल के लाशों की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन ?
( राजीव कुमार ओझा )
आखिर इस खौफ की दवा क्या है?
रावर्ट्सगंज (सोनभद्र)
कोविड 19 को हर आम व खास तक पहूंचाने के लिये कोरोना नाम किस महारथी ने दिया यह शोध का विषय है।टीवी चैनलों ने कहां किस शोध पत्र से ज्ञान हासिल कर चीख चीख कर जन सामान्य को भयाक्रांत करने के लिये कोरोना की भयावह लांचिंग करते हुए यह ज्ञान गंगा प्रवाहित करनी शुरू की कि कोरोना का वायरस शीशे पर कितनी देर टिकेगा,दरवाजे,खिड़की की हैंडल पर कितनी देर टिकेगा,फर्श पर कितनी देर टिकेगा,नल के टेप पर कितनी देर टिकेगा ?
यह शोध का विषय है।
टीवी चैनलों पर फैलाई गयी बे पर की खौफनाक जानकारी को मूहरबंद करने के लिये अति विद्वान डाक्टरों का पैनल भी टीवी चैनलों की स्टूडियो मे अवतरित हो गया और लोगों को दो मिनट तक हांथ को सेनेटाईजर या साबुन से कैसे रगड़ रगड़ कर धोना है,नल की टोंटी को केहुनी से कैसे खोल कर हांथ धोना है,कैसे और किस कंपनी का मास्क लगाना है, यह कर कर के दिखाने समझाने लगा।
कोरोना की खौफनाक लांचिंग ने लोगों को इस कदर खौफजदा कर दिया कि लोग यह भूल गए की भारत मे कोरोना आया नहीं लाया गया है।लोग भूल गए कि आत्म प्रवंचित,प्रचारजीवी हुक्काम की सत्ता की सनक, नमस्ते ट्रम्प के शाही आयोजन ,मध्य प्रदेश मे निर्वाचित सरकार को गिराने, खरीद फरोख्त के फार्मूले पर भाजपा की सरकार बनाने की मोदी और अमित शाह की सियासत की वजह से चेतावनी के वावजूद विदेशी फ्लाईट्स को रोका नहीं गया।
अपनी जय जय कार कराने की सनक मे चीन के बुहान तक से अमीरजादों को विशेष विमान भेज कर लाया गया। बहरहाल खौफ की सफल लांचिंग मे शामिल टीवी चैनलों और टीवी चैनलों के सुर मे सुर मिलाते डाक्टरों की थर्मल स्कैनर,आक्सीमीटर, सेनेटाईजर ,साबुन, पीपीई किट, मास्क निर्माताओं से क्या और कैसी डील थी? इन निर्माताओं ने खौफ की मार्केटिंग मे कितनी कमाई की,कालाबाजारियों ने कितनी कमाई की ?
फार्मा कंपनियों ने कितनी कमाई की ? थर्मल स्कैनर, पीपीई किट,मास्क,साबुन,सेनेटाईजर निर्माताओं,फ़ार्मा कंपनियों ने चैनलों और डाक्टरों को कैसे उपकृत किया यह भी शोध का विषय है।कोरोना काल मे कोरोना को काल बना कर पेश करने के लिये बाहर से घर मे प्रवेश करने के लिये अनगिनत एहतियाती उपाय लोगों को इमला की तरह रटाए गए।
जूता- चप्पल घर के बाहर उतारने,फौरन से पेश्तर बाथरूम मे घुस कर सारे कपड़े उतार कर नहाने,उतारे गए कपड़ों को साबुन या डिटर्जेंट पाउडर से धोने ,बाहर से लाए गए फल,सब्जी,अन्य सामानों को कितने घंटे तक नहीं छूना है यह समझाया गया।डाक्टरों का पैनल कोरोना संक्रमण के लक्षण बताने लगा,लोगों को खौफजदा करने के लिये यह बताया जाने लगा कि जिन लोगों मे कोरोना के बताए गए लक्षण हैं वह भी खतरे मे हैं और जिन लोगों मे कोई लक्षण नहीं हैं वह भी खतरे मे हैं।
खौफ की मार्केटिंग करते डाक्टरों ने यह कहना शुरू किया कि कोरोना वायरस हवा मे तैर रहा है।
खौफ के जाल से कोई बच न जाए इसे मद्देनजर रखते हुए बुहान मे लाशों का अंबार टीवी चैनलों पर दिखाया जाने लगा।
अस्पतालों से कोरोना संक्रमित मरीजों की लाश इस अंदाज मे बाहर लाई जाती दिखाई जाने लगीं गोया वह लाश नहीं टाईम बम हों और पीपीई किट मे ढ॔का तुपा मेडिकल,पैरा मेडिकल स्टाफ बम डिस्पोजल दस्ता हो।
जिस अभागे की मौत होती थी उसके परिजनों को मृतक के अंतिम दर्शन,अंतिम संस्कार करने से बंचित रखा गया।
इस खौफ ने लोगों के दिल दिमाग पर ऐसा घातक असर किया कि परिवार के सदस्य अस्पताल प्रबंधन या प्रशासन से यह पूछना भूल गए कि जब कोरोना वायरस की मारक क्षमता मात्र दो गज बताते हो तब परिवार के लोग अपने परिवार के मृत सदस्य का अंतिम दर्शन दो गज की दूरी से क्यों नहीं कर सकते?
खौफजदा लोग यह सबाल करना भूल गए कि कोरोना संक्रमित मरीज का अंतिम संस्कार उन्ही एहतियाती उपायों के साथ वह क्यों नहीं कर सकते जिन एहतियात के साथ पीपीई किट धारी मेडिकल/ पैरामेडिकल स्टाफ कर सकते हैं?
खौफ की मार्केटिंग करते टीवी चैनलों, फार्मा कंपनियों, खौफ की मार्केटिंग के प्रमोटर नामचीन डाक्टरों और सरकार की चांडाल चौकड़ी के गठबंधन पर फिर कभी लिखेंगे।
फिलहाल खौफ की मार्केटिंग की वजह से टूटते सामाजिक, पारिवारिक रिश्तों और कोरोना के घोषित या संदिग्ध शिकार होकर काल कवलित हुए उन अभागे लोगों की बात करनी प्रासंगिक है जिनको चार कंधे नसीब नहीं हो सके, जिनका उनके धार्मिक रीति रिवाज से सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार नहीं हो सका।खौफ के दलदल मे फंसे जिनके अपनों ने उनको लावारिस छोड़ दिया। जिनकी लाशों को गंगा,यमुना सहित विभिन्न नदियों मे फेंक दिया गया,नदियों के किनारे बालू से दबा दिया गया,जिनकी लाशों को कुत्ते नोच नोच कर खाने लगे।
लाशों की इस दुर्दशा का मुजरिम कोरोना की भयावह लांचिंग करने बाले टीवी चैनलों का गैंग और इस गैंग द्वारा की गयी भयावह लांचिंग को मुहरबंद करने वाले गैर जिम्मेदार डाक्टरों का वह काकस है जिसने कोरोना संक्रमित मरीजों की लाशों को टाईम बम की तरह अस्पतालों से निकालना शुरू किया ,मृत मरीज के परिवार के सदस्यों को ” दो गज की दूरी ” के खुद के बनाये प्रोटोकॉल के तहत मृतक के अंतिम दर्शन से बंचित किया,अंतिम संस्कार करने से रोका।एक सुनियोजित साजिश के तहत इन चिकित्सकों ने यह बात लोगों को नहीं बताई कि कोरोना संक्रमित मरीज की मृत्यु होने पर उसकी लाश से संक्रमण का खतरा नहीं होता।
गौरतलब है कि
एबीपी न्यूज टीवी चैनल पर एम्स भोपाल के डायरेक्टर डा.सरमन ने बताया कि कोरोना के पहले तांडव के समय कोरोना मरीज की मृत्यु होने पर संक्रमण के खतरों की जानकारी लेने के लिए कोरोना संक्रमित मरीज की लाश का पोस्टमार्टम किया गया था और सरकार को बता दिया गया था कि कोरोना संक्रमण से मृत मरीज की लाश से संक्रमण का खतरा नहीं है।
लाश का अंतिम संस्कार सम्मानजनक तरीके से उनके परिवार के लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कर सकते हैं। डा. सरमन ने यह भी बताया कि कोरोना संक्रमित मरीज की लाश को कंधा देने बाले लोग और शव यात्रा मे शामिल लोग सामान्य कोरोना प्रोटोकाल का पालन करें ,मास्क और ग्लब्स का उपयोग जरूर करें।
वाराणसी से प्रकाशित दैनिक जागरण मे 24 मई को आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने भी कमोबेश यही बात एक नयी बात के साथ कि कोरोना मरीज की मौत के 24 घंटे बाद लाश से संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता है कही है।
हालात बताते हैं कि लोग खौफ के दलदल मे फंसे रहें इसकी साजिश बदस्तूर जारी है।कोरोना वायरस से हजार गुना घातक है खौफ का वह वायरस जो टीवी चैनलों द्वारा फैलाया जाता रहा है, फैलाया जा रहा है।
सच तो यह है कि लोगों को कोरोना वायरस कम मार रहा है खौफ का वायरस ज्यादा मार रहा है।
हमसभी को यह सोचने की जरूरत है कि इस खौफ के वायरस से लोगों को कैसे बचाया जाए खौफ के दलदल मे फंसाए गए लोगों को कैसे उबारा जाए? लाशों को चार कंधे कैसे नसीब हों ,कैसे लाश का सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार हो सके?
TTM news se Anand Prakash Tiwari ki report