कांग्रेस का पलायन काल- राजीव कुमार ओझा
रावर्ट्सगंज (सोनभद्र)
वर्ष 2014 से 2021 के कालखंड की समीक्षा करें तब हम इस कालखंड को कांग्रेस का सांगठनिक पराभव काल कह सकते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस के शताधिक बागियों की मदद से भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया।2014 की शर्मनाक पराजय से कांग्रेस ने न तो कोई सीख लेने की जरूरत समझी न ही अपने क्षत विक्षत सांगठनिक ढांचे का पुनर्निर्माण कर अपनी खोई सियासी जमीन वापस पाने के लिये कोई गंभीर प्रयास करने की जरूरत समझी।
कांग्रेस एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने मे भी नाकाम रही यही वजह है कि मोदी सरकार की जुल्मी नीतियों से त्रस्त अवाम कांग्रेस पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। गैर भाजपा दलों को साधने के मोर्चे पर भी रणनीतिक भूलों का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा है लेकिन जमीनी हकीकत को समझने को कांग्रेस आलाकमान कतई गंभीर नजर नहीं आता।24×7 चुनावी मिशन मे रहने वाली भाजपा का मुकाबला वह कांग्रेस कैसे कर सकती है जिसके पास तकरीबन दो वर्ष से स्थायी अध्यक्ष नहीं है।
गांधी परिवार और गांधी परिवार के कुलदीपक राहुल गांधी के खाते मे नाकामियों की लंबी चौड़ी सूची मौजूद है।कई राज्यों मे विधान सभा चुनाव जीतने के वावजूद कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी, मध्य प्रदेश मे जिस ज्योतिरादित्य सिंधिया के अथक प्रयास से कांग्रेस का सियासी वनवास समाप्त हुआ कांग्रेस आलाकमान की उपेक्षा और अहंकार के कारण उस ऊर्जावान नेता को भाजपा की शरण मे जाने को वाध्य होना पड़ा। कांग्रेस आलाकमान खास तौर पर राहुल गांधी ही सिंधिया जैसे ऊर्जावान नेता को खोने और मध्य प्रदेश की सत्ता से बेदखल होने के जिम्मेदार हैं।
यही स्थिति राजस्थान की रही,टीम राहुल के सचिन पायलट ने रात दिन जमीनी कार्य कर कांग्रेस का सियासी वनवास समाप्त कराया। सत्ता हासिल होने पर सचिन पायलट की जैसी उपेक्षा की गयी उसने यह सिद्ध कर दिया की युवाओं को आगे बढ़ाने के लिये राहुल गाँधी की कथनी और करनी मे छत्तीस का आंकड़ा है।मठाधीशी कर संगठन को रसातल मे पहूंचाने वाले अशोक गहलोत सचिन पायलट के लिये अमर्यादित बयानबाज़ी करते रहे और राहुल -सोनिया-प्रियंका की तिकड़ी चुप्पी साधे रही।
2013-2014 से कांग्रेस छोड़ कर जाने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी है।देश की सियासी तकदीर का फैसला करने वाले उत्तर प्रदेश मे चंद महीनों बाद विधान सभा चुनाव होने हैं। भाजपा अभी से 2022 के सियासी चौपड़ पर शह और मात के खेल मे जुट गयी है। कांग्रेस आलाकमान, यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी सोती रहीं और भाजपा ने जितिन प्रसाद के रूप मे कांग्रेस का एक मोहरा पीट डाला।
गौरतलब है कि गांधी परिवार के खास रहे जितिन प्रसाद ने कांग्रेस से छिटके- बिदके ब्राह्मणों को कांग्रेस मे वापस लाने की गंभीर कोशिस शुरू की थी।वह लगातार योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताते हुए उत्तर प्रदेश मे निरंतर हो रही ब्राह्मणों की हत्या, उत्पीड़न के मुद्दे पर आक्रामक थे। जितिन प्रसाद ने कांग्रेस क्यों छोड़ी? भाजपा मे ही क्यों गए? इस सबाल का बेहतर जबाब तो वही दे सकते हैं, लेकिन जैसी भोंड़ी और हास्यास्पद वजह जितिन बता रहे हैं वह उनको हंसी का पात्र बनाने को काफी है।
बकौल जितिन वह कांग्रेस मे रहते हुए जनसेवा नहीं कर पा रहे थे इसलिये वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा की गोद मे जा बैठे ।उस भाजपा की गोद मे जा बैठे जिसकी उत्तर प्रदेश सरकार को वह ब्राह्मण विरोधी, ब्राह्मणों की हत्यारी बता रहे थे।उनसे यह पूछा जाना चाहिये कि अब योगी सरकार के संदर्भ मे उनकी राय क्या है ? अब ब्राह्मणों के उत्पीड़न, ब्राह्मणों की हत्या के मुद्दे पर उनकी राय क्या है?जितिन भाजपा का कितना भला कर पायेंगे इसका जबाब तो वक्त देगा लेकिन जितिन के कांग्रेस छोड़ने से कांग्रेस की छवि एक ऐसे डूबते जहाज जैसी जरूर बन रही है जिस पर सवार दिग्गज कांग्रेसियों का पलायन बदस्तूर जारी है।
प्रसंगवश 17 मार्च 2018 को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम मे संपन्न कांग्रेस के 84वें अधिवेशन की चर्चा जरूरी है।इस अधिवेशन के खाली मंच से राहुल गांधी ने आक्रामक और युवाओं मे उम्मीद जगाता भाषण दिया था।राहुल ने कहा था यह मंच कांग्रेस के युवा शेरों के लिये खाली रखा गया है।अब कांग्रेस मे पैराशूट से नेताओं की लांचिंग नहीं होगी,युवाओं को सम्मान जनक प्रतिनिधित्व मिलेगा। 2018 के बाद हुए चुनावों मे राहुल का यह भाषण सियासी लफ्फाजी सिद्ध हुआ।ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे ऊर्जावान नेता को कांग्रेस छोड़नी पड़ी।कांग्रेस मठाधीशी करने वाले दगे पटाखों के नचाए नाचती रही।
कांग्रेस आलाकमान अभी तक बागी दिग्गज मठाधीशों के ग्रुप 23 से अपने मतभेद दूर नहीं कर सकी है।जो हालात हैं उनमे देर सबेर सचिन पायलट भी अपनी अलग राह चुन लें तब आश्चर्य की बात नहीं होगी। कांग्रेस आलाकमान न तो अपने लोगों को सहेजने ,संभालने की चिंता कर रही है न ही संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा करने की कोशिस कर रही है।वह समझने को तैयार नहीं है कि मोदी ने उसे मीडिया के रथ पर सवार हो कर सत्ता से बेदखल किया है ,मोदी से सफल सियासी जंग के लिये उसे भी मीडिया के रथ पर सवार होकर सियासी जंग लड़नी होगी।
कांग्रेस आलाकमान अभी भी इस मुगालते मे जी रहा है कि गांधी परिवार का नेहरू-इंदिरा-राजीव वाला ग्लैमर उसे सियासी वैतरणी पार करा देगा।
अपनी खोई सियासी जमीन हासिल करने के लिये कांग्रेस को फौरन से पेश्तर आत्म-मंथन करने की जरूरत है।उसे यह मोटी बात समझने की जरूरत है कि खोई जमीन वापस पाने के लिये जमीन पर उसे मजबूत, जमीनी कार्यकर्ताओं की,मजबूत जमीनी संगठन की जरूरत है।
भाजपा को परास्त करने के लिये मजबूत मीडिया मैनेजमेंट की ,सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ की जरूरत है,आम आदमी का भरोसा जीतने के लिये उसके दुःख दर्द, उसकी समस्याओं को लेकर जमीनी आंदोलन करने की जरूरत है। कांग्रेस आलाकमान को अपने इर्द गिर्द जमे या जमाए गए लोगों की मानिटरिंग करने की जरूरत है,विभीषणों को चिन्हित करने की जरूरत है। आलम यह है कि यूपी का प्रभार संभाल रही प्रियंका गांधी का एक सलाहकार ऐसा व्यक्ति है जिसने डा.मनमोहन सिंह को काला झंडा दिखाया था।
कांग्रेस नहीं चेती और पलायन रोकने की गंभीर कोशिस नहीं की,मध्य प्रदेश,राजस्थान, कर्नाटक, पंजाब मे कांग्रेसियों मे जारी घात- प्रतिघात ,ग्रुप 23 के बागी तेवर के आलोक मे संवादहीनता की स्थिति से नहीं उभरी तब यह तय है कि भारतीय राजनीति मे वह अप्रासंगिक हो जाएगी।यह भी तय है कि वह चेत जाए ,मोदी सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन मे संचित आक्रोश को समझ ले और जमीन पर खुद को भाजपा के विकल्प के रूप मे स्थापित कर सके तब मोदी का सियासी किला ध्वस्त कर वह अपनी सियासी प्रासंगिकता कायम रख सकेगी।
TTM news se Anand Prakash Tiwari ki report