Friday, August 29, 2025

प्यार का अमन का माहौल बनाए रक्खा अपने दुश्मन को भी सीने से लगाए रक्खा मुझको वो और किसी का भी तो होने न दिया

नाम नसीम साज़
पिता का नाम -मोइनुद्दीन
माता नाम- बानो
जन्म स्थान – नियाउज आज़मगढ़
जन्म तिथि – 15 मई 1993
पता _ नियाउज आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, (भारत )पिन : 276305
मोबाइल न०. 9621253629, 8299056866
शिक्षा _ एम० ए० डीएलएड
सम्प्रति_ शिक्षक, शायर, मुशायरा एवं कवि सम्मेलन संचालक, आल इंडिया मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों में शिरकत,विभिन्न चैनलों से समय समय पर प्रसारण, समाज सेवी इत्यादि l
1
प्यार का अमन का माहौल बनाए रक्खा
अपने दुश्मन को भी सीने से लगाए रक्खा
मुझको वो और किसी का भी तो होने न दिया
ज़िन्दगी भर के लिए अपना बनाए रक्खा
कोई दीनार कमाया तो किसी ने दिरहम
हमने परदेस में बस दर्द कमाए रक्खा
आईना उसको दिखाने का रिएक्शन देखा
आसमांं सर पे सितमगर ने उठाए रक्खा
वो ना आया है ना आने का है इमकां कोई
महफिले दिल को मगर फिर भी सजाए रक्खा
ग़म की आंधी ने बुझा पाया ना अब तक जिसको
इक चराग़ ऐसा मोहब्बत का जलाए रक्खा
‘साज़’ उस शख्स को अल्लाह सलामत रक्खे
हौसला जिसने मेरे दिल का बढ़ाए रक्खा
2
कलेजा मुंह को आता है इसे लोगो सुनाने में
बला का दर्द पिनहां है मोहब्बत के फसाने में
जरूरत घर की अब दो सौ से भी पूरी नहीं होती
चलाते थे कभी घर लोग अपना चार आने में
अभी से नन्हें पौधों पर न कीजे तबसिरा कोई
अभी तो वक्त है दरकार इनको लहलहाने में
किसी को अश्क बारी से कभी फुर्सत नहीं मिलती
कोई मसरूफ रहता है हमेशा मुस्कुराने में
हम्हीं से मैकदा आबाद है पीर ए मुग़ा तेरा
न हम होंगे तो होगा कौन तेरे बादा खाने में
कई घर और भी आ जाएंगे इस आग की ज़द में
ये तुमने क्यों नहीं सोचा हमारा घर जलाने में
बड़ी मुश्किल से कोई क़ीमती शय हाथ आती है
मगर कुछ वक़्त लगता ही नहीं इसको गंवाने में
तमन्ना है मेरी ऐ ‘साज़’ मुझसे रूठता कोई
किसी रूठे को आता है मज़ा मुझको मनाने में
3
तेरे अंदाजे़ तकल्लुम का असर काफी है
दिल उचकने को फक़त एक नज़र काफी है
दिल की दुनिया में चराग़ाँ की ज़रूरत ही नहीं
रोशनी के लिए इक दाग़ ए जिगर काफी है
और वो हैं जो बदल देते हैं रस्ता हर दिन
हमको तो एक ही बस राह गुज़र काफी है
ज़िन्दगी राहे वफा पर तुझे लाने के लिए
हम हुनरवर के लिए एक हुनर काफी है
दर पे औरों के भला किस लिए जाए यारो
‘साज़’ के वास्ते जब एक ही दर काफी है
4
यह तो कभी ना था मेरे वहमो गुमान में
कट जाएगी ये उम्र मेरी इम्तिहान में
अश्कों में डूब जाओगे सुनकर मेरे रक़ीब
इस दर्जा रंजो ग़म हैं मेरी दास्तान में
उर्दू की कर रहे थे जो कल तक मुखालिफत
अब गुफ्तगू वो करते हैं उर्दू ज़बान में
इक दूसरे में होने लगे दूरी का गुमा
इतना भी फैसला ना रहे दरमियान में
जिनकी वफा परस्ती की तमसील ही नहीं
गुज़रे हैं ऐसे लोग मेरे खानदान में
वह सिर्फ और सिर्फ खुदा की ही ज़ात है
आता नहीं है फर्क़ कभी जिसकी शान में
ऐ ‘साज़’ जो मैं जा न सका आसान तक
कुछ तो कमी ज़रूर थी मेरी उड़ान में
5
तुम्हारा प्यार कल दीमक बनेगा जानता हूं
मेरी शाख ए वफा में घुन लगेगा जानता हूं
चरागे़ आरज़ू मैंने जलाया है जो प्यारे
हवा की ज़द में रहकर भी चलेगा जानता हूं
बुलंदी पर मेरी किस्मत का तारा इन दिनों है
ये मत पूछो की किस-किस को खलेगा जानता हूं
रहेगा मंदिरो मस्जिद का झगड़ा कब तलक ये
तअस्सुब शहर में कब तक रहेगा जानता हूं
बज़ाहिर जो दिखाई दे रहा है मेरा मुखलिस
वही मेरी तबाही पर हंसेगा जानता हूं
तेरे हाथों मेरा घर ढाया जाएगा किसी दिन
फिर उसके बाद घर तेरा सजेगा जानता हूं
गिला ऐ ‘साज़’ उसका खत्म होना है उसी दम
गले जब ईद पर मुझसे मिलेगा जानता हूं
6
लड़खड़ा कर संभल रहा हूं मैं
कितना लोगों को खल रहा हूं मैं
इक समुंदर हूं फिर भी साथ अपने
लेकर क़तरों को चल रहा हूं मैं
कह दो इन ग़म ज़दा चरागों से
रुक हवा का बदल रहा हूं मैं
हादसों से न तू डरा मुझको
हादसों ही में पल रहा हूं मैं
ऐ हवेली न नाज़ कर इतना
तुझसे पहले महल रहा हूं मैं
दी है आवाज़ तो न जा दुश्मन
घर से बाहर निकल रहा हूं मैं
‘साज़’ हर शब ग़ज़ल के सांचे में
बनके अल्फाज़ ढल रहा हूं मैं
7
मुझे था जिंदगी भर ग़म इसी का
ना रक्खा पास मैंने जिंदगी का
फरेबी हो गई है आज दुनिया
भरोसा क्यों किसी पर हो किसी का
खुदा का शुक्र है मेरी अना ने
न खोला राज़ मेरी मुफलिसी का
किसानों की ये मजबूरी है वरना
किसी का शौक है क्या खुदकुशी का
वह पर्वत है कोई राई नहीं है
न दावा कर तू उसकी हमसरी का
चमन में ‘साज़’ फिर लौटे न शायद
जो कल मौसम था अमनो आशती का
8
जो यतीमों का माल खाते हैं
वो सदा बद्दुआ कमाते हैं
उसने भी हो ये क्या ज़रूरी है
भूखे प्यासे भी लड़खड़ाते हैं
यह तो फितरत है इश्क वालों की
जीती बाज़ी जो हार जाते हैं
हम कोई चांद है न तारे हैं
शुक्र है फिर भी मुस्कुराते हैं
वह भी एक दिन ज़रूर रोएंगे
हंसने वालों को जो रुलाते हैं
‘साज़’आंधी से जो नहीं डरते
रेत का घर वही बनाते हैं

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