Friday, August 29, 2025

राष्ट्र मना रहा ‘कारगिल विजय दिवस’, PM मोदी ने देश पर जान न्योछावर करने वाले बहादुरों को दी श्रद्धांजलि

राष्ट्र मना रहा ‘कारगिल विजय दिवस’, PM मोदी ने देश पर जान न्योछावर करने वाले बहादुरों को दी श्रद्धांजलि

 

देश-दुनिया के इतिहास में 26 जुलाई तमाम अहम वजह से दर्ज है। यह तारीख हर भारतीय के लिए बेहद खास है। दरअसल, 26 जुलाई 1999 को ही भारतीय सेना ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तान को कारगिल की लड़ाई में हराया था। यह युद्ध करीब 84 दिन तक चला था। ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में भारत के लिए यह गौरवशाली तारीख है। इसलिए आज (बुधवार) 26 जुलाई 2023 को राष्ट्र भारतीय सेना के सैनिकों के बलिदान को याद करते हुए ‘कारगिल विजय दिवस’ मना रहा है।

 

*पीएम मोदी ने देश पर जान न्योछावर करने वाले बहादुरों को दी श्रद्धांजलि*

 

इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश पर जान न्योछावर करने वाले बहादुरों को श्रद्धांजलि दी है। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सैन्य बलों के प्रमुख (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान और तीनों सेनाध्यक्षों ने कारगिल युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर 1999 के कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

 

*‘कारगिल युद्ध’ 1999 की लड़ाई*

 

‘कारगिल युद्ध’ 1999 की वही लड़ाई थी, जिसमें पाकिस्तानी सेना ने अपना धोखेबाज चरित्र दिखाते हुए द्रास-कारगिल की पहाड़ियों पर भारत के विरुद्ध साजिश व विश्वासघात से कब्जा करने की कोशिश की थी। उस दौरान भारतीय सेना ने अपनी मातृभूमि में घुस आए घुसपैठियों को बाहर खदेड़ने को एक बड़ा अभियान चलाया, जिसमें भारतीय सेना के 527 रणबांकुरों ने अपने बलिदान से मातृभूमि को दुश्मनों के नापाक कदमों से मुक्त किया। इनमें से 52 रणबांकुरे हिमाचल के सपूत थे। कैप्टन विक्रम बतरा को अदम्य साहस और पराक्रम के लिए मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।

 

*घायल होकर भी लड़ते रहे थे सेना के 1363 जांबाज, ऐसे लिखी अपनी शौर्य गाथा*

 

सेना के 1363 जांबाजों ने घायल होकर भी न केवल लड़ाई लड़ी बल्कि उसे अंजाम तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया। कारगिल की यह लड़ाई दुनिया के इतिहास में सबसे ऊंचे क्षेत्र में लड़ी गई लड़ाई थी। बात 1999 की है, जब पाकिस्तानी सेना घुसपैठिया बन भारतीय क्षेत्र में घुसी व कारगिल की ऊंची-ऊंची चोटियों पर कब्जा जमा लिया। यह अपने आप में पूरे विश्व में अनूठा युद्ध था जब एक और घुसपैठिए सैनिक 15 हजार फीट ऊंची पहाड़ियों की चोटी पर कब्जा जमाकर बैठे थे, जिससे वे श्रीनगर-द्रास-कारगिल राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात व सेना की रसद को आसानी से निशाना बना रहे थे। वहीं दूसरी ओर आनन-फानन में पहुंची भारतीय सेना नीचे सपाट मैदानों में थी या यूं कहें भारतीय सेना पाकिस्तानी घुसपैठियों के लिए बहुत ही आसान टारगेट थी। भारतीय सेना के पास न तो घुसपैठियों की ताकत व संख्या की सही जानकारी थी, न ही ऐसे अभियानों में प्रयुक्त किए जाने वाली विशेष ड्रैस व दूसरे उपकरण थे। साथ ही इस अभियान में अधिकतर हमले माइनस तापमान वाली रातों में किए जाते थे, लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय सेना ने अपनी शौर्य गाथा लिखी। इसी शोर्य गाथा को देश आज याद कर रहा है और ‘कारगिल विजय दिवस’ मना रहा है।

 

*द्रास में कारगिल युद्ध स्मारक पर मनाया गया श्रद्धांजलि समारोह*

 

लद्दाख स्थित द्रास में कारगिल युद्ध स्मारक पर सैन्य परम्परा के साथ हुए इस श्रद्धांजलि समारोह के पास से तीन चीतल हेलीकॉप्टर गुजरे और फूलों की पंखुड़ियां बरसाईं। कारगिल विजय दिवस पर चार मिग-29 विमानों ने द्रास में कारगिल युद्ध स्मारक से उड़ान भरी। इसके बाद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने द्रास में कारगिल युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करके 1999 के कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

 

*सर्वोच्च बलिदान करने वाले सैनिकों की स्मृति में स्थापित किया था ‘कारगिल युद्ध स्मारक’*

 

इस युद्ध में मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान करने वालों की स्मृति में कारगिल युद्ध स्मारक की स्थापना की गई है। यह द्रास में है। खास बात यह है कि इस स्मारक में पाकिस्तान की सेना के बंकर भी हैं। देश के सबसे ठंडे इलाके में स्थापित इस स्मारक पर जाना किसी के लिए भी शानदार अनुभव हो सकता है। द्रास वह इलाका है, जहां सर्दियों में तापमान-35 डिग्री सेल्सियस हो जाता है और कभी-कभी तो इससे भी कम।

✍️ UP 18 NEWS से आशीष मोदनवाल की रिपोर्ट

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