कविता,,,,,,,,,
“रिमझिम ये बारिश की बूंदे”,
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घिर आती है काली घटाएं,
पुरवाई जब चलती है।
रिमझिम ये बारिश की बूंदे,
बड़ी सुहानी लगतीहै।।
प्यासी धरती तृप्त हो जाती,
नदियां भी इतराती है।
बाग-बगीचे हरे हो जाते ,
कलियां भी मुस्काती है ।।
धानी चुनरिया धरतीओढ़े,
नवल कामिनी लगती है।
रिमझिम ये बारिश की बूंदे ,
बड़ी सुहानी लगती है।।
हरे खेतऔर बाग-बगीचे,
देख कृषक हर्षाता है।
जैसे निज संतति को देखकर ,
पिता नेह बरसाता है ।।
जग जाती आशा की किरणें,
पीर पुरानी लगती है।
रिमझिम ये बारिश की बूंदे,
बड़ी सुहानी लगती है।
बागों में झूले पड़ जाते
कोयल गीत सुनाती है ।
फूलों पर भंवरे मंडराते,
पपिहा टेर लगाती है ।।
सावन साजन लौट के आएं,
रुत मस्तानी लगती है।
रिमझिम ये बारिश की बूंदे,
बड़ी सुहानी लगती है।।
स्वरचित मौलिक,,,,,,
मधुलिका राय “मल्लिका”
गाजीपुर ।।
उत्तर प्रदेश