चित्रअभिव्यक्ति
“चांद से मुलाकात हो गई”
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आज रात यूं ही मेरी,
चांद से मुलाकात हो गई ।
मौन थे अधर,
नजर से बात हो गई।
उसने कहा- नित मौन यूं ??
मुझ को निहारा क्यूं करे।
क्या दर्द है तेरे जिगर में,
ये नैन निश दिन क्यूं ढरे।
क्यों बुत बनी पाषाण सी,
उर अंतर्द्वंद से भरे ।
यह काया तेरी मरमरी ,
क्यूं प्यार खुद से ना करें ।
मैंने कहा मेरी तरह,
कुछ तू भी तो मौन है।
जगते हो सारी रात ,
जिसके लिए वो कौन है।
मुस्कराए अधर ,
पर नैन तो बेचैन है।
है दर्द सागर सा भरा पर
सिले सिले से बैन है।
दोनों का दर्द ,
कुछ एक जैसा दिख रहा
दिखता नहीं है जख्म,
फिर भी हर पल वो रिस रहा।
साज -श्रृंगार मेरी
खुशगवारी ले गया ।
खामोशियां बेचैनियां और बेख्याली दे गया।
इस दुनिया से इतर ,
कही दूर हम और तुम चले।
खुशियों भरी हो रागनी ,
और प्यार का गुलशन खिले ।
स्वरचित मौलिक
मधुलिका राय “मल्लिका” गाज़ीपुर
उत्तर प्रदेश