Friday, August 29, 2025

चांद से मुलाकात हो गई

चित्रअभिव्यक्ति

 

“चांद से मुलाकात हो गई”

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आज रात यूं ही मेरी,

चांद से मुलाकात हो गई

मौन थे अधर,

नजर से बात हो गई।

उसने कहा- नित मौन यूं ??

मुझ को निहारा क्यूं करे।

क्या दर्द है तेरे जिगर में,

ये नैन निश दिन क्यूं ढरे।

क्यों बुत बनी पाषाण सी,

उर अंतर्द्वंद से भरे ।

यह काया तेरी मरमरी ,

क्यूं प्यार खुद से ना करें ।

मैंने कहा मेरी तरह,

कुछ तू भी तो मौन है।

जगते हो सारी रात ,

जिसके लिए वो कौन है।

मुस्कराए अधर ,

पर नैन तो बेचैन है।

है दर्द सागर सा भरा पर

सिले सिले से बैन है।

दोनों का दर्द ,

कुछ एक जैसा दिख रहा

दिखता नहीं है जख्म,

फिर भी हर पल वो रिस रहा।

साज -श्रृंगार मेरी

खुशगवारी ले गया ।

खामोशियां बेचैनियां और बेख्याली दे गया।

इस दुनिया से इतर ,

कही दूर हम और तुम चले।

खुशियों भरी हो रागनी ,

और प्यार का गुलशन खिले ।

 

स्वरचित मौलिक

मधुलिका राय “मल्लिका” गाज़ीपुर

उत्तर प्रदेश

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