Friday, August 29, 2025

अधेड़ उम्र  अक्सर उम्र के एक पड़ाव पर आकार जिंदगी थम सी जाती है,

अधेड़ उम्र

अक्सर उम्र के एक पड़ाव पर आकार जिंदगी थम सी जाती है, जहां एक तरफ मन हर तरफ से ऊब जाता है वही दूसरी तरफ अधेड़ उम्र या एक उम्र बीत जाने के बाद हम अपने आप से कुछ वादे कर लेते है है कि अब हम अपनी जिंदगी कुछ इस तरह बिताएंगे।

मेरी ये कविता उन स्त्रियों के मन की बात कहना चाहती है जिन्होंने एक उम्र तक बहुत adjust किया, सबके लिए किया और अब उन्होंने ठान लिया कि बस अब बहुत हो गया “बहुत जी लिए सबके लिए अब थोड़ा सा जीना है खुद के लिए ”

 

 

 

पहले जो भागती थी दिन रात तुम्हारें पीछे पीछे ,

आज कुछ थम सी गई है वो,

इसीलिए नहीं की तुम्हारें साथ उसे प्यारा नहीं,

ब्लकि उम्र के इस पड़ाव पर खुद के लिए भी रुकना सीख गई है वो।

 

पहले जो रहती थी हर दम डरी सहमी सी वो,

अब अंदर से सशक्त और मज़बूत हो गई है वो।

बिखरी बिखरी सी रहती थी हर वक़्त वो,

पर अब सबकुछ बैलेंस करना सीख गई है वो।

 

 

 

 

 

चुप हो जाती है वो आज भी कुछ जगह पर,

पर अब अपने विचारों को भी रखने से डरती नहीं है वो।

अपने फर्ज से आज भी समझोता नहीं करती वो,

पर फर्ज के लिए खुद से समझोता नहीं करती है वो।

अपने सपनों को मार कर सबको सपने दिखाती थी जो,

अब अपने सपनों में भी उड़ान भरना सीख गई है वो।

पहले जो ढूँढा करती सुकून हर किसी में,

अब अकेले में सुकून ढूंढ लेती है वो।

अब पूछती नहीं तेरी ही तरह बता के जाती है वो,

घर के बाहर भी एक दुनिया है जान गई है वो।।

 

मन ही मन में जीवन की परतें खोलें

हर वस्तु जब ढल जाती है केवल धुंधली स्मृतियों में,

तब फुर्सत के पलों में झांकती वो अपने अंतर्मन में,

ठान लेती अभी भी वक़्त है जीना है खुद के लिए भी।

 

 

“एक उम्र गुजार दी उसने सबकी खुशियों के लिए,

अब खुद के लिए भी जीना सीख गई है वो।

बहुत कुछ अपने मन का करने लग गई है वो,

फिर भी अपना फर्ज और मर्यादा नहीं भूली है वो।”

 

 

 

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