Friday, August 29, 2025

छितौना कांड पर उबाल: क्षत्रिय नेताओं संग DM-DIG की बैठक, करणी सेना ने प्रदर्शन टाला, महासभा ने किया वॉकआउट

छितौना कांड पर उबाल: क्षत्रिय नेताओं संग DM-DIG की बैठक, करणी सेना ने प्रदर्शन टाला, महासभा ने किया वॉकआउट

वाराणसी, छितौना कांड को लेकर बनारस में सवर्ण संगठनों का आक्रोश लगातार तेज होता जा रहा है। सोमवार को सर्किट हाउस में जिलाधिकारी और डीआईजी की अगुवाई में करणी सेना और क्षत्रिय महासभा के नेताओं के साथ साढ़े दो घंटे लंबी बैठक हुई। बैठक में पुलिस प्रशासन ने निष्पक्ष जांच का भरोसा देते हुए 48 घंटे का समय मांगा है। इसी के साथ करणी सेना ने मंगलवार को चौबेपुर में प्रस्तावित प्रदर्शन को स्थगित कर दिया है, लेकिन क्षत्रिय महासभा इस फैसले से सहमत नहीं है और बैठक से वॉकआउट कर आर-पार की चेतावनी दे दी है।

करणी सेना ने रखी मांग: अरविंद राजभर पर दर्ज हो केस

करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह रघुवंशी ने बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि सुभासपा के राष्ट्रीय महासचिव अरविंद राजभर ने करणी माता, क्षत्रिय समाज और सवर्ण समुदाय को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 48 घंटे के भीतर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, तो बड़ा जनांदोलन होगा।

महासभा ने जताई नाराज़गी, प्रदर्शन पर अडिग

करणी सेना के प्रदर्शन स्थगित करने के फैसले के बाद क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह बैठक से नाराज़ होकर बाहर निकल गए। उन्होंने ऐलान किया कि वे हर हाल में मंगलवार को प्रदर्शन करेंगे। उनका कहना था – “स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं होगा, चाहे इसके लिए जेल ही क्यों न जाना पड़े।”

तनाव की जड़: छितौना में राजभर समाज की एंट्री

गौरतलब है कि 5 जुलाई को छितौना गांव में ठाकुर और राजभर समाज के बीच खेत में मवेशी घुसने को लेकर विवाद हुआ था, जो मारपीट तक जा पहुंचा। 12 जुलाई को सुभासपा नेता अरविंद राजभर पीड़ित परिवार को चेक देने पहुंचे, लेकिन उस दौरान उनके कथित बयान और समर्थकों के व्यवहार ने गांव में तनाव बढ़ा दिया। आरोप है कि अरविंद राजभर ने करणी माता और ठाकुर समाज को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।

प्रशासन की कोशिशें और चुनौती

प्रशासन ने मामले की जांच के लिए SIT का गठन कर दिया है और 48 घंटे में कार्रवाई का आश्वासन दिया है। लेकिन मंगलवार को संभावित प्रदर्शन और टकराव को रोकना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ा है।

स्थिति अब संवेदनशील मोड़ पर है। एक ओर समुदाय विशेष का आक्रोश, दूसरी ओर प्रशासन की समय मांगी गई रणनीति – सवाल यही है कि क्या 48 घंटे में कोई निर्णायक कदम उठेगा या फिर बनारस एक और बड़े आंदोलन का गवाह बनेगा?

 

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