Friday, August 29, 2025

क्षेत्रीय पिछड़ापन के कारण कहीं हम तो नहीं हैं ।भारत में आज़ादी की शताब्दी अभी नहीं मनायी गयी है ।सैंकड़ों वर्षों से ग़ुलाम अर्थव्यवस्था, संस्कृति, परम्परा को पटरी पर लाना आसान बात नहीं होता है ।१९४७ में आज़ाद हुए भारत ने १९५० में देश चलाने के लिए संविधान बना लिया

*क्षेत्रीय पिछड़ापन के कारण कहीं हम तो नहीं हैं ।*

भारत में आज़ादी की शताब्दी अभी नहीं मनायी गयी है ।सैंकड़ों वर्षों से ग़ुलाम अर्थव्यवस्था, संस्कृति, परम्परा को पटरी पर लाना आसान बात नहीं होता है ।१९४७ में आज़ाद हुए भारत ने १९५० में देश चलाने के लिए संविधान बना लिया और लोकतंत्र के रूप में सारी ताक़त जनता जनार्दन के हाथ में दे दिया ।इसी लोकतंत्र रूपी बज़्र से प्रहार करके जनता ने जब चाहा जिसको चाहा उसे सिंघासन से उतार दिया और जिसको चाहा उसे लोकतंत्र का राजा बना दिया ।लोकतंत्र की ताक़त को समझने के लिए जनता की ताक़त को समझना होगा और जनता की ताक़त को समझने के लिए स्वयं की ताक़त को समझना होगा क्यूँकि हम जनता है और जनता ही जनार्दन है ।

प्रायः हम किसी व्यक्ति, संस्थान एवं क्षेत्र के विषय में विकासशील, विकसीत अथवा पिछड़ा होने की बात करते है । हम समीक्षा करने में यह भूल जाते हैं कि हम जिस क्षेत्र में रहते है वह कितना पिछड़ा है । ऐसी कौन सी मूल सुविधाएँ है जो हमारे क्षेत्र में नहि है? वह कार्य जो एक बार होने पर चिर स्थायी रह सकते थे लेकिन उसका प्रयास लोकतंत्र कि ताक़त से चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने नहि किया ? शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सड़क, सिंचाई के क्षेत्र में क्या हो सकता था ? यह प्रश्न अपने साथ अनेकानेक यक्ष प्रश्न स्वयं ही खड़े करते है ।
हमारा ध्यान इस पर गया और हमने यथा शक्ति चिंतन किया तो ही हम जनता जनार्दन है अन्यथा छले हुए मतदाता से अधिक हम कुछ भी नहि है । हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्षेत्रीय पिछड़ापन के कारण कहीं हम तो नहीं है ।

प्रारम्भिक अध्ययन काल में हिंदी कि कक्षा में हम कहानियाँ पढ़ते थे जिसमें शिकारी जाल बिछाकर शिकार करता था ।जवानी में हमने चारा लगाकर मछली मारते गाँव- गाँव देखा है ।बकरे को बलि से पहले माला पहनाते देखा ही होगा ।माना यह सब आप आधुनिकता के नशे में भूल भी गए हो तब भी फ़िल्मी पर्दे कि हर कहानी में नशाखोरी में युवाओं को डुबाकर, बन्दूक के बल पर अथवा पैसे बाँटकर, गाड़ियों के क़ाफ़िले से आकर्षण बनाकर चुनाव जीतने वाला नेता जनता से अप्रत्यक्ष रूप से कैसे बदला चुकाता है यह तो आपको याद ही होगा ।हमें इन दृष्टान्तों को समझना होगा और संकल्प लेना होगा कि शिकारी के चारे का माला पहनकर हम लोकतंत्र और विकास कि बलि नहीं चढ़ाएँगे । हम क्षेत्र के पिछड़ापन के कारण नहीं बनेंगे ।

अनुसंधान हमारे जीवन शैली का हिस्सा रहा है ।किसान अपनी फसलों के साथ, कारीगर अपनी कारीगरी के साथ, राजनेता अपने अनुभव के साथ सामाजिक परिवर्तन का अनुसंधान करता था ।इसके लिए किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती थी ।आज हर विषय पर अनुसंधान करने के लिए विश्वविद्यालय खुले है लेकिन हमारे द्वारा स्वचेतना से पारम्परिक तर्कशक्ति का संचयन हो सके यह प्रयास बिलकुल बंद हो गया है । इसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ा और यह इतनी गहराई तक चला गया कि लोकतंत्र के रास्ते सामाजिक परिवर्तन के इस मूल हथियार को ही हमने जातिवाद, सम्प्रदायवाद, परिवारवाद, अर्थवाद, व्यक्तिवाद के जंग लगाकर इसकी धार को कुन्द कर दिया ।सैंकड़ों साल की ग़ुलामी से आज़ाद हुए भारत को मानसिक ग़ुलामी कि ज़ंजीरो में जकड़ दिया ।

पूर्ण लोकतांत्रिक देश में भारत माता की जय के नारे का विरोध करके कोई हमें मानसिक ग़ुलाम बना रहा है तो कोई रावण बनने कि प्रेरणा देकर शोषण रोकने के नाम पर शोषण करने को प्रेरित कर रहा है ।कोई वैज्ञानिको के प्रतिभा पर सवाल खड़ा कर रहा है तो किसी पार्टी को माँ बेटा मिलकर चला रहे है ।हम राजनीतिक कार्यकर्ता से ज़्यादा क़ुर्बानी गैंग के सदस्य होते जा रहे है ।हम विकास-पिछड़ापन विषय से कोसो दूर है ।सही-ग़लत के परिधि के बाहर ही हम पक्षकार बनना स्वीकार कर लेते है ।विचार और विचारधारा आधारित जीवन तो आवश्यक है लेकिन वैचारिक ग़ुलामी पिछड़ेपन का कारण बन जाती है ।

संगठन की विचारधारा महापुरुषों के विचारधारा पर आधारित होती है ।सभी राजनीतिक, ग़ैर राजनीतिक संगठन किसी न किसी महापुरुष के विचारो पर ही बनते है ।ईमानदारी, त्याग, शील का सम्बल उनके जीवन को परम वैभव पर ले गया ।सामाजिक समरसता उनके जीवन का अर्थ था ।सरलता, सुलभता, सहजता उनके आचरण में थी ।चिंतन मंथन सबकी दिनचर्या में शामिल था ।ऐसे ही कोई जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, डा० सम्पूर्णानंद, पं० दीनदयाल उपाध्याय नहीं बनता ।इनके चरणो में नमन कर इनके आदर्शों को जीवन आदर्श बनाकर और ऐसे ही आदर्श वाले जननेता को लोकतंत्र की थाती देकर हम पिछड़ा क्षेत्र होने के कलंक को मिटा सकते है ।

भारत में राजनीति का सच्चा अर्थ लोकतंत्र की स्थापना से है और लोकतंत्र की स्थापना जनता के हाथ में है । अभी तक के इतिहास में लोकतांत्रिक परिवर्तन का अगुआ हमेशा गाँव-गरीब, किसान, नौजवान की बात करने वाला रहा है ।प्रायः परिवर्तन क़ा ध्वज सामान्य परिवारों से निकले लोगों के हाथ में रहा है अथवा सब कुछ त्याग कर सामान्य बनने वाले लोगों के हाथ में रहा है । साधन और संसाधन की वकालत करने वाले लोग अपना उल्लू तो सीधा कर सकते है लेकिन परिवर्तनकारी विकास के नायक कभी नहीं बन सकते है ।सीमित संसाधन से तख्ता पलट कर देना हमारा पसंदीदा खेल रहा है । आज़ादी कि लड़ाई इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । आइए हम सब मिलकर सबका साथ सबका विकास के नारे को बुलन्द करे और गाँव-गरीब, किसान के बेटों को अथवा उनके सुख-दुःख में अपना सुख-दुःख देखने वालों को अपना नायक बनाकर पिछड़ापन दूर करने के परिवर्तनकारी इतिहास में सहभागी बने ।

अरविन्द पाण्डेय

आशीष मोदनवाल की रिपोर्ट

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