Friday, August 29, 2025

धरती पर पाप के विनाश के लिए अवतरित हुए श्री राम-चिंतामणि महाराज जी

धरती पर पाप के विनाश के लिए अवतरित हुए श्री राम-चिंतामणि महाराज जी

सोनभद्र,

राबर्ट्सगंज ब्लॉक के मझिआंव(सलैया) स्थित हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्री राम कथा ज्ञान यज्ञ में चित्रकूट धाम से पधारे कथा व्यास चिंतामणि महाराज जी ने भगवान श्री राम के जन्म का वर्णन किया।उन्होंने श्री राम जन्म का गुणगान करते हुए कहा कि भगवान राम का सातवां अवतार माने जाने वाले प्रभु श्री राम ने हमेशा की अधर्म पर धर्म की विजय हेतु अवतार धारण किया है। टीवी पर तो हम सभी ने रामायण देखी होगी लेकिन फिर भी कई ऐसे प्रसंग रह जाते हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं होती है। कुछ ऐसी ही है प्रभु श्री राम की जन्म कथा। आज जागरण आध्यात्म के इस विशेष प्रस्तुति में हम श्री राम की जन्म कथा के कुछ उन पहलुओं के बारे में बताएंगे जिनसे लोग अंजान हैं।
महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। महाराज दशरथ ने श्यामकर्ण घोड़े को चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वाने का आदेश दिया। महाराज ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को बुलावा भेजा। वो चाहते थे कि सभी यज्ञ में शामिल हों। यज्ञ का समय आने पर महाराज दशरख सभी अभ्यागतों और अपने गुरु वशिष्ठ जी समेतअपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि के साथ यज्ञ मण्डप में पधारे। फिर विधिवत यज्ञ शुभारंभ किया गया। यज्ञ की समाप्ति के बाद समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट दी गई हैं और उन्हें सादर विदा किया गया।यज्ञ के प्रसाद में बनी खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को दी। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों गर्भवती हो गईं। सबसे पहले महाराज दशरश की बड़ी रानी कौशल्या ने एक शिशु को जन्म दिया जो बेहद ही कान्तिवान, नील वर्ण और तेजोमय था। इस शिशु का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजित थे। साथ ही कर्क लग्न का उदय हुआ था। फिर शुभ नक्षत्रों में कैकेयी और सुमित्रा ने भी अपने-अपने पुत्रों को जन्म दिया। कैकेयी का एक और सुमित्रा के दोनों पुत्र बेहद तेजस्वी थे।महाराज के चारों पुत्रों के जन्म से सम्पूर्ण राज्य में आनन्द का माहौल था। हर कोई खुशी में गन्धर्व गान कर रहा था और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवताओं ने पुष्प वर्षा की। महाराज ने ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी और उन सभी ने महाराज के पुत्रों को आशीर्वाद दिया। प्रजा-जनों को महाराज ने धन-धान्य और दरबारियों को रत्न, आभूषण भेंट दी। महर्षि वशिष्ठ ने महाराज के पुत्रों का नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा।जैसे-जैसे ये चारों बड़े होने लगे रामचन्द्र अपने गुणों से प्रजा के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए। उनमें ऐसी विलक्षण प्रतिभा थी जिसके जरिए वो कम आयु में ही समस्त विषयों में पारंगत हो गए थे। वे हर बात में निपुण थे जैसे हर तरह के अस्त्र-शस्त्र चलाने में, हाथी-घोड़े की सवारी में आदि। वे अपने माता-पिता और गुरुजनों का बेहद आदर करते थे और उनकी सेवा में लगे रहते थे। उनके तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी उनका अनुसरण करते थे।रामचरित मानस में कहा गया है कि नवमी तिथि मधुमास पुनीता। सुकल पक्ष अभिजीत हरिप्रीता।। मध्यदिवस अतिशीत न घामा पावन काल लोक विश्रामा।।
इस पंक्ति के आधार पर माना जाता है कि राम का जन्म दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट के मध्य हुआ था। ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि ‘चक्रसुदर्शन मुहूर्त’ में नारायण ने पृथ्वी पर जन्म लिया था। आदिकाल में विश्वकर्मा ने इसी मुहूर्त में सूर्य के अतिशय तेज से शिव का त्रिशूल, वज्र, और चक्र सुदर्शन का निर्माण किया था। यह मुहूर्त आज भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके मध्य किया गया कोई भी कार्य कभी असफल नहीं होता। अतः राम मंदिर निर्माण के लिए 05 अगस्त को दोपहर का चक्रसुदर्शन मुहूर्त यानी कि अभिजित मुहूर्त ही श्रेष्ठ रहेगा। 5 अगस्त को अभिजीत मुहूर्त में ही राम मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है।कथा में युवक मंगल दल के जिलाध्यक्ष सौरभ कान्त पति तिवारी ने कथा व्यास चिंतामणी महाराज जी का माल्यार्पण कर स्वागत किया।कथा में क्षेत्रीय श्रोताओं की काफी भीड़ रही।उक्त अवसर पर आयोजन समिति के सदस्य ग्राम प्रधान हरि शंकर श्रीवास्तव,सत्यम विश्वकर्मा, ललित देव पाण्डेय,श्याम सुंदर,श्री राम विश्वकर्मा,रोशन,मंगला शर्मा, ऑर्गन पर मोनू मिश्रा,ढोलक वादक जितेंद्र सिंह,पैड वादक चुनार से गगन आदि लोग उपस्थित रहे।

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