Friday, August 29, 2025

श्रावण शुक्ला सप्तमी, संवत 2080 : चार सौ साल बाद भी जीवित हैं गोस्वामी तुलसीदास

श्रावण शुक्ला सप्तमी, संवत 2080 : चार सौ साल बाद भी जीवित हैं गोस्वामी तुलसीदास

फ्रंचेस्का ओरसीनो तीन दशक पूर्व अपनी एक कविता में लिखते हैं कि मैं तो जब कभी फिर से जन्म लूँगा तुलसी मुझे हमेशा जीवित मिलेंगे

 

*★18वीं सदी में पाश्चात्य विचारक स्व आक्टीयो पॉज ने कहा कि हनुमान जी ने कॉपीराइट का अधिकार तुलसीदास को दिया*

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*चिकित्सक के रूप में तुलसीदास*

‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता—‘ की तराजू पर यदि गोस्वामी तुलसीदास को तौला जाए तो तुलसी के अनेकानेक रूप दिखाई देते हैं । कहा जा सकता है कि तुलसी का रूप-स्वरूप अनन्त है । यदि हरि अनन्त पर तुलसी की नजर पड़ती है तो यूं ही नहीं पड़ती क्योंकि तुलसी से पहले भी अनेकानेक विद्वानों ने ईश्वर के सहस्त्र रूप तथा कोटि-कोटि क्षमता का जिक्र किया है लेकिन तुलसीदास के ‘हरि अनन्त’ में मेडिकल साइंस की दृष्टि समाहित है । सारा चिकित्सकीय विज्ञान व्यक्ति के तन और मन पर हार्मोन्स का प्रभाव बताता है । कहीं न कहीं तुलसीदास एक कुशल चिकित्सक के रूप में इस हार्मोन्स के प्रभाव को समझ कर ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पँच रचित यह अधम शरीरा’ चौपाई में हार्मोन्स के असन्तुलन के चलते तन पक्ष का रोग पकड़ते हैं तो एक चिकित्सक के ही रूप में ‘बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा’ के माध्यम से बेहतर तन-मन के लिए मेडिकल साइंस द्वारा शरीर की ग्रन्थियों (जोड़ों) की महत्ता पर की ओर भी नजर रखते है । मानव शरीर से ही भगवद्-भक्ति हो सकती है ।

*★योगाचार्य के रूप में*

सारा धर्मशास्त्र इस बात पर जोर देता है कि जीवन में सर्वाधिक बहुमूल्य मानव तन है । ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशि’ चौपाई में खुद गोस्वामी जी ने इसे स्पष्ट कर दिया । लिहाजा इसके लिए तुलसीदास पतंजलि के योगशास्त्र को रामचरित मानस में आवश्यकता बताते हैं । पहले तो ‘उल्टा नाम जगत जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना’ से स्पष्ट है कि राम का उच्चारण जिह्वा से नहीं बल्कि नाभि से जब होने लगे तो परमानन्द की अनुभूति स्वमेव होने लगेगी । स्पष्ट भी है कि जो वाल्मीकि साधुओं के कहने पर ‘मरा’ जप सकते थे वह सीधा ‘राम’ भी जप लेते लेकिन योगशास्त्र का सिद्धांत देखते हुए तुलसी ने 21वी सदी में अति भौतिकता के दौर में गिरते स्वास्थ्य और अधोपतन की ओर जाते मनुष्य की सोच को उर्ध्वगामी बनाने में योग की आवश्यकता महसूस की ।

 

*★कर्मनिष्ठ तुलसीदास*

तुलसी मानसिक स्वास्थ्य के पहले स्वस्थ शरीर के लिए विशालकाय समुद्र से ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारि, सकल ताड़ना के अधिकारी’ कहलवाया । तुलसी ने निरोगी काया के लिए ढोल जैसे शरीर जिसमें 5 प्रकार के वायु हैं और इस शरीर की महत्ता न समझ कर छोटी (क्षुद्र) हरकत करते गंवारपन एवं पशुवत आचरण तथा शरीर में विद्यमान 72 करोड़ नाड़ियो को निरन्तर प्रताड़ित करने का सन्देश दिया है । यहां अकर्मण्यता एवं आलस्य के खिलाफ शंखनाद करते तुलसी दिखाई पड़ते हैं । स्वस्थ तन-मन की दवा के रूप में सक्रिय जीवन औषधि बताते हैं तुलसीदास । कर्मवाद में वे द्वापर युग के महानायक योगेश्वर कृष्ण बन जाते हैं और ‘प्रविसि नगर कीजै सब काजा, हृदय राखि कोसलपुर राजा’ चौपाई के जरिए लोकहित का चिंतन करने वाला राजा या प्रशासक जो कार्य करता है उस भाव में सामान्य व्यक्ति भी कार्य करता है तो कहीं से आपत्तिजनक नहीं है । योग-सिद्धांत को प्रतिपादित तुलसी ने खुद अपने जीवन पर ईश्वरीय अनुकंपा को जन-जन को उपलब्ध कराने के भाव से किया ।

 

*★कम्प्यूटर विशेषज्ञ तुलसीदास*

सामान्य रूप से तुलसी के लिए यह किंवन्दति है कि पत्नी से मिलने वे उसके मायके गए और सांप पकड़ कर घर में घुसे लेकिन इस घटना की गहराई में जाने पर तो प्रतीत होता है कि तुलसी ने योग की सतत साधना की और जब मूलाधार चक्र में स्थित कुंडली मारे बैठा सर्प जागृत होकर सहस्रार की ओर गया तो वर्तमान कम्प्यूटर साइंस जिन तरंगों के जरिए विकास के क्षेत्र में क्रान्ति कर रहा है वहीँ काव्यजगत में तुलसीदास ने किया ।

 

*★आक्टीयो पॉज के विचार*

पाश्चात्य विद्वान आक्टीयो पाज ने अपनी पुस्तक ‘दि मंकी ग्रामेरियन’ में उल्लेख किया है कि वाल्मीकि से पहले श्रीहनुमान ने रामकथा अपने नाखूनों पर लिखी । वाल्मीकि को जब पता चला तो वे अपना रामायण ले के गए । हनुमान जी द्वारा काव्यमय कथा पढ़कर दुखी हुए क्योंकि उनका रामायण लोकभाषा में नहीं था । वाल्मीकि को लगा कि हनुमान जी का काव्य ज्यादा लोकप्रिय हो जाएगा । वे दुखी हुए । उनका दुःख देख तथा बातचीत में वाल्मीकि द्वारा यह कहे जाने पर कि वे अपना रामायण जला देंगे तो श्री हनुमान ने ऐसा न करने का वाल्मीकि से अनुरोध किया और नाखूनों पर लिखा अपना काव्य आकाश में प्रवाहित कर दिया । निश्चित रूप से हनुमान के नाखून रूपी चिप्स और सी डी से तरंगों में प्रवाहित रामकाव्य योग की सिद्धि से तुलसी को मिला ।

तुलसी रामचरित मानस की शुरुआत बालकाण्ड की प्रथम स्तुति में ही इसकी ओर इंगित करते दिखाई पड़ते है । ‘वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि । मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ

।।’ में तुलसीदास अक्षरों और उसकी महत्ता से जुड़े कम्प्यूटर साइंस और सूचनाक्रान्ति के महत्त्व को प्रतिपादित कर रहे हैं । तरंगों में विद्यमान क्षमता की वजह से तुलसी ने ‘व’ अक्षर से मानस की रचना शुरू की तो उत्तरकाण्ड का अंत ‘मानवा:’ से करके तुलसी ने वायुमण्डल की इस महत्ता को पकड़ने वाले वैज्ञानिक को मानव नहीं अनेकानेक मानवों में श्रेष्ठ महामानव बना दिया । उत्तर काण्ड के 80 से 129 वीं चौपाई तक वे 21वीं सदी की सामाजिक विकृतियों को कागभुशुंडि के मुख से कहलवा रहे हैं । आज जब 21वीं सदी में महाशक्ति राष्ट्र अमेरिका आतंकवादी ओसामा लादेन का पता लगाने में प्रशिक्षित कौओं का प्रयोग कर रहा है तो तुलसी भी कुण्डलनी जागरण कर कागभुशुण्डि की तरह भगवान श्रीराम के मुख में जाकर अनेक लोकों का भ्रमण किया और अतीत, वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य जिसमें 21 वीं सदी भी शामिल है, को जरूर देखा । तभी तो पाश्चात्य विद्वान फ्रंचेस्का ओरसीनो तीन दशक पूर्व अपनी एक कविता में लिखते हैं कि मैं तो जब कभी फिर से जन्म लूँगा तुलसी मुझे हमेशा जीवित मिलेंगे ।

 

✍️ UP 18 NEWS से आशीष मोदनवाल की रिपोर्ट

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