संत प्रवणानंद सरस्वती चिरईगांव। जाल्हुपुर स्थित परम पूज्य संत श्री कच्चा बाबा आश्रम में गुरूवार को आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा संगम देखने को मिला। मध्य प्रदेश के सुप्रसिद्ध ओमकालेश्वर मंदिर से पधारे दो दर्जन से अधिक संतों के सान्निध्य में भव्य सत्संग का आयोजन किया गया।इस अवसर पर सद्गुरुदेव प्रणवानंद सरस्वती जी एवं संत राघवानंद जी सहित अन्य महात्माओं ने जीवन, संस्कार और ईश्वर भक्ति पर मर्मस्पर्शी प्रवचन किया। संत राघवजी महाराज ने कहा कि संस्कारों से ही सभ्य समाज का निर्माण सम्भव है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी बच्चे के जीवन में संस्कारों की नींव उसके घर से ही पड़ती है। बच्चे को संस्कार की प्रथम शिक्षा अपने माता-पिता से ही प्राप्त होती है। यदि माता-पिता स्वयं सत्संग करेंगे और धर्म के मार्ग पर चलेंगे, तभी उनकी संतान सदाचारी और धर्मपरायण बनेगी। वहीं संत प्रवणा नंद सरस्वती ने साधु-संगति की महिमा का बखान करते हुए कहा कि जिस अशुद्धि या विकार को जल और अग्नि भी स्वच्छ नहीं कर सकती, उसे संतों के विचार और उनका सान्निध्य निर्मल कर देता है। संतों का संग मनुष्य के अंतर्मन की गंदगी को धोकर उसे पवित्र बना देता है। इसके अलावा सुख और शांति के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि संसार की वस्तुओं से मिलने वाला सुख उत्तेजना से भरा और अस्थाई होता है। यह केवल जाग्रत अवस्था तक सीमित है। जैसे गहरी नींद में मनुष्य को कोई दुख नहीं होता, क्योंकि वहां संसार का विस्मरण हो जाता है। लेकिन समाधि वह अवस्था है जहां कुछ न होते हुए भी परम सुख और आनंद की अनुभूति होती है। सांसारिक वस्तुओं में शांति ढूंढना व्यर्थ है। भगवान के भजन के बिना वास्तविक शांति संभव नहीं है।संसार और परमार्थ के बीच संतुलन बनाने की सीख देते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता हमें सबको साथ लेकर चलना सिखाती है। जीवन की नैया को पार लगाने के लिए सत्संग की सरिता में गोता लगाना अनिवार्य है।






