शिक्षक दिवस पर विशेष: शिक्षक को शिक्षक ही रहने दिया जाए।
डा राजेश सिंह चौहान
जनमत न्यूज़ इटावा
बकेवर
सुविधाभोगी व्यक्ति शिक्षक नहीं बन सकता है। शिक्षक वही हो सकता है जिसमें त्याग तपस्या लगन चारित्रिक शुद्धता और शिक्षण के माध्यम से सच्चरित्र पीढ़ियों के निर्माण करने का जज्बा हो। अधिकतर व्यक्ति शिक्षक का कार्य बहुत ही हल्के में लेते हैं। उनको शिक्षक में कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं। वे शिक्षक की तुलना अन्य मुलाजिमों से करते हैं और कहते हैं कि शिक्षक की नौकरी तो मुफ्त की हुआ करती है। कोई काम नहीं और ढ़ेर सारी पगार।
आप इस तरह की गिरी हुई सोच वाले व्यक्ति शिक्षित अर्ध शिक्षित और अशिक्षितों में बहुतायत देख सकते हैं। उनकी सोच में , *कार्य करने का पैमाना क्या है * , यह तो वे ही बेहतर बतला सकते हैं। शायद वे शिक्षक से भी वही काम करवाना चाहते हैं जो किसी फैक्टरी के कर्मचारी से करवाया जाता है। उनकी सोच शिक्षक के कार्य पर नहीं जाती है। वे यह नहीं सोच पाते हैं कि हर पेशे का कार्य अलग तरह का होता है। बढ़ई और सुनार के कार्य अलग होते हैं। लेकिन इन लोगों को कौन समझाये कि शिक्षक मोची नहीं होता है। वह राष्ट्र निर्माता होता है,वह राष्ट्र के लिए अच्छे नागरिक तैयार करके देता है, वह अपने ज्ञान के माध्यम से देश में सुख समृद्धि के बीज बोता है, वह अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाले रास्ते का ज्ञान करवाता है।
मुझे याद है जब मैं पडरौना में अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहा था तो हमारे विद्यालय में कुछ प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले शिक्षक हमारी प्राथमिक कक्षाओं में आते थे और हम बच्चों को वे चित्र की मदद से बालकहानियों को पढ़ाया करते थे। हम बहुत ही चाव से उन चित्रों को देखते थे और हर बात हमारे मन मस्तिष्क में स्पष्ट रूप से अंकित हो जाती थी। मेरे कहने का मतलब है शिक्षक का कार्य उतना आसान नहीं होता है जिस अपरिपक्व सोच का चलन आजकल देखने को मिलता है।यह कार्य मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। शिक्षक को कई भूमिकाओं से गुजरना होता है। वह न्यायाधीश भी है तो वह मनोवैज्ञानिक भी है, वह शिक्षक भी है तो वह अभिभावक भी है। वह सुन्दर अभिव्यक्ति करने वाला व्याख्याता भी है तो वह कुशल अभिनेता भी है। वह एक कुशल नैतिक अनुशासक है तो वह शिष्य के कल्याण के लिए कुछ भी कर देने वाला हितकारक भी है। वह ब्रहमा विष्णु शंकर से उच्च साक्षात पारब्रह्म परमेश्वर भी है। वह एक मुलाजिम नहीं है, वह तो आत्मज्ञान सम्पन्न परम पूज्य उदार हृदय का वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास करने वाला उत्कृष्ट प्राणी होता है। उसकी तुलना अन्य श्रमजीवियों से करने वाले नादान ही हुआ करते हैं।
मेरे अड़तीस वर्ष के शैक्षणिक जीवन में कई तरह की स्थितियों परिस्थितियों से मुझे गुजरना पड़ा लेकिन हमने अपने शिक्षण को कभी गौण नहीं माना। हमने पूर्ण मनोयोग से अपना शैक्षणिक उत्तर दायित्व पूर्ण करने की कोशिश की। अपना सर्वोत्तम अपने विद्यार्थियों को देने की सफल कोशिश की। हमने विद्यार्थियों और ज्ञानार्जन को ही अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया। इसलिए हमें हर जगह अपने विद्यार्थियों का सम्मान स्नेह मिलता रहा जो अवकाश ग्रहण करने के उपरांत भी यथावत कायम है। मुझे अपने शिक्षक होने पर गर्व है क्योंकि हम इसी कार्य के लिए कुदरत द्वारा धरती पर उतारे गये थे।
आज हमारे हजारों हजार विद्यार्थी देश विदेश में कार्य कर रहे हैं समाज नवनिर्माण कर रहे हैं इससे बड़ी और क्या उपलब्धि हो सकती है एक शिक्षक के लिए। कहने के लिए बहुत सी निगेटिव बातें होती ही हैं पर निगेटिव होना कोई अच्छी बात नहीं है। शिक्षक की निन्दा करने वाले वैचारिक दरिद्र होते हैं । उनसा कुसंस्कारित व्यक्ति कहीं नहीं मिल सकता है।
आज डॉ राधाकृष्णन जी का जन्म दिन भी है। उस महान विभूति को कोटिशः नमन जिसने राष्ट्रपति के पद से शिक्षक के पद को अधिक गुरुत्व प्रदान किया।शिक्षक वह वटवृक्ष होता है जिसके विचारबीज सार्वकालिक होकर उसके शिष्यों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी समाज राष्ट्र और विश्व को अपना फल देकर स्वतंत्र चिन्तन की ऊर्जा प्रदान करते हैं। शिक्षक का कार्य कम्प्यूटर मशीनें नहीं ले सकती हैं। शिक्षक को शिक्षक ही रहने दिया जाये,तभी राष्ट्र का कल्याण है।
आयरन लेडी रीना सिंह
जन संघ सेवक मंच राष्ट्रीय अध्यक्ष
UP 18 NEWS से राजेश मिश्रा की रिपोर्ट