Friday, August 29, 2025

अतीत के आईने में अधरों में प्यास लिए दौड़ रहे कूप- कूप—‘मधु गोरखपुरी’

अतीत के आईने में
अधरों में प्यास लिए दौड़ रहे कूप- कूप—‘मधु गोरखपुरी’

ऐतिहासिक साबित हुआ था सोन साहित्य संगम का आंचलिक कवि सम्मेलन
सोनभद्र,
‘अधरों पे प्यास लिए दौड़ रहे कूप- कूप ..,
हाय ये ! प्रचंड धूप ! हाय ये प्रचंड धूप ‘ !
वरिष्ठ पत्रकार एवं सोन साहित्य संगम के निदेशक मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी ‘मधुर गोरखपुरी’ की यह कालजयी रचना एक दर्शन है, यथार्थ हैं, अनुभव है और प्रयोग है जो कवि की यथार्थ अल्फ़ाज़ बनकर ढल गए लगते हैं । यह आदिवासियों एवं श्रमिकों की हकीकत है। साथ ही सत्ता को आगाह करने की आवाज़ भी है। जब
विपक्ष कमज़ोर हो, दिशाहीन हो,विखरा हुआ हो और
दिग्भर्मित हो कर किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था मे हो तथा सत्ता पक्ष अपनी
रचनात्मकता भूल रहा हो, ऐसे में कवि की
जिम्मेदारी, पत्रकार का दायित्व और साहित्यकार
का चिन्तन ही विपक्ष की भूमिका में आ जाता है । तब साहित्यकार को ही ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ता है।
पत्रकारों को जनता के प्रति जबाब देह माना जाता है । बताते चलें कि राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ सत्ता में रहते हुए विपक्ष की चूक को पूरा करते थे ।
यही काम जनपद के सुकृत परिक्षेत्र स्थित प्रकृति की गोद में आयोजित एक आंचलिक कवि सम्मेलन में शामिल सभी रचनाकारों की
रचनाएँ आम जन के हित के लिए उठाई गई ऐसी आवाज
थी, जिससे हुक्मरानों के बंद कान , मूंदी पलकें उघड़ जाय। सभी कवियों , रचना धर्मियों का आयोजक समाजसेवी व साहित्यकार इकबाल अहमद द्वारा भव्य अभिनंदन, जो
एकात्मता का
अदभुत आयोजन सिद्ध हुआ था । उस समय के आयोजक साहित्यकार तत्कालीन ग्राम प्रधान इकबाल अहमद तो परस्पर प्रेम और सौहार्द के उदाहरण बन गए थे । उनकी
सरस्वती वन्दन और नवरात्र पर रचना यह साबित कर दी थी कि सोनभद्र जिले में ‘चेहरे नहीं इन्शान पढ़े जाते हैं, मज़हब नहीं ईमान पढ़े जाते हैं, यह भी वो जनपद
है, जहाँ गीता और कुरान एक साथ पढ़े जाते हैं’। पत्रकार भाई नसीम जी की गंगा जमुनी तहजीब जनपद में
एक मील के पत्थर की तरह साबित हुई थी । एकात्मता की बुनियाद भर कर साहित्यकारों ने जो महफ़िल सजाई थी, वो एकता की अदभुत मिसाल बन गई थी । कहने में जरा भी गुरेज नहीं यदि कि यदि यही माहौल पूरे
देश का बना दिया जाय तो मंजर ही बदल जाय ।
मैं और तू गर हम
हो जाते,
कितने हंसी मंजर हो
जाते ।
एक ऐसी बुनियाद बनाई जा सकती है, जिसपर एकता की जगमगाती मीनार तामीर
करने में सहुलियत होगी ।
सोन साहित्य संगम के संस्थापक संयोजक राकेश शरण मिश्र की सोच का
मैं कायल हूँ कि वे ऐसे नवोदित कवियों को मंच उपलब्ध करा रहे है जिन्हें बड़े मंचो पर जगह नही
मिल पाती ।
संस्था के निदेशक
वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी , उपनिदेशक सुशील कुमार ‘राही’, गीतकार डॉ रचना तिवारी,
ईश्वर विरागी, नईम गाजीपुरी,
शिवनरायन ‘शिव’ , अमरनाथ ‘अजेय’ , दिवाकर द्विवेदी ‘मेघ
विजयगढ़ी’ ,दिलीप कुमार ‘दीपक’ प्रभात सिंह चंदेल , राजेश द्विवेदी ‘राज’, ज्ञानदास कनौजिया ,सन्तोष कुमार नागर , राजेश गोस्वामी,
संजीव श्रीवास्तव, राम अनुज धर द्विवेदी, अरुण पांडेय,समेत चंदौली जिले से आए स्मृति शेष डॉ हौशला प्रसाद द्विवेदी और एच एन पांडेय , आदि ने इस ऐतिहासिक आंचलिक कवि सम्मेलन को न केवल यादगार बना दिया था बल्कि सौहार्द की एक ऐसी मशाल भी जला दी थी जिसकी रोशनी में साम्प्रदायिक
उन्माद की समस्या के समाधान के लिए राह तलासी जा सकती है । बिडंबना ही है कि कोरोना काल मे चंदौली जिले के चकिया
तहसील क्षेत्र के दुबेपुर गांव के डॉक्टर हौशला प्रसाद द्विवेदी और एच एन पांडेय जी का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया लेकिन उनकी रचनाएं आज भी जीवित है और समाज की एकता के लिए भटके हुए उन्मादियों को जगाती रहेंगी ।
मीडिया फोरम ऑफ इंडिया न्यास और सोन साहित्य संगम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सुकृत का वाह
आंचलिक कवि सम्मेलन को
कोई कैसे भुला सकता है ।

Up18news se chandramohan Shukla ki report

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