Sunday, April 19, 2026
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आध्यात्म जीवन को सुंदर बनाने का बेहतरीन तरीका- अजीत पांडये

 

आध्यात्म जीवन को सुंदर बनाने का बेहतरीन तरीका- अजीत पांडये

वाराणसी, आज भेलूपुर स्थित सामाजिक संस्था दिशा सोसाइटी के प्रधान कार्यालय पर आयोजित “आध्यात्म व समाज ” विषयक संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए संस्था के सचिव व प्रमुख समाजसेवी अजीत पांडय ‘बाबुल’ ने कहा कि “रामलीला” तुलसीदास जी ने प्रारंभ की रामलीला मान्यता है कि रामचरित मानस के प्रचार-प्रसार के लिए तुलसीदास ने रामलीला की शुरूआत की थी। हालांकि तुलसी की रामलीला के पहले भी रामकथा के गायन और उनके चरित्र के नाट्य स्वरूप का जिक्र मिलता है। जैसा कि बाल्मीकि रामायण में लवकुश रामकथा का गायन करते हैं। इसी तरह महाभारत में तथा हरिवंश पुराण में भी राम के चरित्र को लेकर नाटक का उल्लेख मिलता है।
सीता है पृथ्वी, राम हैं आकाश। उन दोनों का मिलन ही रामलीला है-पृथ्वी और आकाश का मिलन और रामलीला प्रत्येक के भीतर घट रही है। तुम्हारी देह सीता है; तुम्हारी आत्मा, राम। तुम्हारे भीतर दोनों का मिलन हुआ है- पृथ्वी और आकाश का, मर्त्य का और अमृत का। तुम्हारे भीतर दोनों का मिलन हुआ है। और उस सब में जो भी घट रहा है, सभी रामलीला है। “रामलीला ” अर्थात भगवान राम की लीला यानि श्री राम की कहानियां ,रामलीला हिंदू महाकाव्य-रामायण में भगवान राम के पूर्ण जीवन, मूल्य, सिद्धांत और उनके जीवन की यात्रा शामिल हैं। रामलीला के माध्यम से श्री राम के जीवन के हर विशेष पहलू को प्रदर्शित किया जाता है पहले की रामलीला वाल्मीकि रचित रामायण पर आधारित होती थी परंतु आजकल इसे तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस को आधार मानकर आयोजित किया जाता हैं। रामलीला केवल एक नाटक नही अपितु जीवन को सैद्धांतिक मूल्यों यापन करने का संदेश देती हैं। अजीत पांडये ‘बाबुल’ ने कहा कि रामलीला मंचन को वर्षों से भारतीय संस्कृति के दर्शन में महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि ” बढती अपसंस्कृति-भौतिकतावाद एवं पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से लोगों की आध्यात्मिक और मानसिक शांति क्षीण होने लगती है , उसी जगह “रामलीला ” जैसे आयोजन के माध्यम से भगवान राम की कहानियों के जरिए उनसे जुड़े किस्सों के माध्यम से मनुष्यों को सकारात्मक एवं मर्यादित जीवन जीने का संदेश मिलता है। अगर बात की जाए रामलीला के प्रसिद्धि की तो वर्तमान विश्व की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में रामनगर में होने वाली सैकड़ों वर्षों पुरानी रामलीला जिसे पूर्व बनारस रियासत के महाराजाओं और उनकी विरासत संभाल रहे उत्तराधिकारियों ने आज भी रामलीला का प्राचीन स्वरूप बनाए रखा है। तामझाम-ग्लैमर की दुनिया से अछूती इस रामलीला को सम्पूर्ण विश्व पटल पर एक अलग पहचान मिली है। गंगा के दूसरे तट पर बसा समूचा रामनगर इन दिनों राममय बना हुआ है, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक एवं आधुनिकता के इस युग में भी इसका आकर्षण आज भी बरकरार है। इस अवसर पर कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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