कलम के सिपाही-
“अर्शी मिर्ज़ा” की कलम से-
आज का उन्वान इंसानियत के हवाले से आपके सम्मुख रख रहा हूं, इस उम्मीद से की आप सिर्फ इसे पढ़कर भूल नहीं जाएं अपितु अपनी नस्लों को इससे परिचित कराएं ताकि आने वाला पल सुनहरा हो वरना सियासत का ये दानव कहीं हमारे सामाजिक ताने बाने को मसल कर ना रख दे और हम यूं ही खड़े अपनी बरबादी का तमाशा देखते ना रह जाए।
आइए शुरू करते है आज का लेख इस दिल छू लेने वाली पंक्ति के साथ कि –
।। नस्लों का करे जो बटवारा,
रहबर वो क़ौम का ढोंगी है।।
।। क्या ख़ुदा ने मंदिर तोड़ा था,
या राम ने मस्जिद तोड़ी है।।
✍️समझना ये है कि आखिर कब हम समझ पाएंगे इन सियासत दानो की चालों को या यूं कहे कि हम इतने बुजदिल और कमज़ोर हो चुके है कि आवाज़ तक नहीं उठा सकते जिन दोस्तो के साथ बैठकर कंधे से कंधा मिलाकर चले, साथ वक्त बिताया, आज उन्ही से बैर आखिर हम कैसे रख सकते है जिनके साथ गंगा जी के घाटों पर गोता लगाया, मंदिर में प्रसाद खाए, होली में अबीर उड़ाए, दीवाली मे दीप जलाए और दूसरी ओर ईद मे एक दूसरे को गले से गले लगाकर रिश्तों को परवाज़ दिया, ईद मिलादुन्नबी मे साथ खड़े रहे, मोहर्रम को अपना ही हिस्सा समझा। आज कहां खोते नज़र आ रहे है वो दिन? आखिर हमे ऐसा क्या हो गया है जो हम हर बात पे एक दूसरे पर कहीं ना कहीं सवालिया निशान लगाते नज़र आ रहे है? कहीं हम इनके चंगुल में इतने फंस तो नहीं चुके है कि हम अपने ही अंग को अपने हाथो से कुर्बान करने पर आमादा है? महादेव के बच्चे है हम – मोहम्मद के दुलारे है।
इस पंक्ति से शायद हमारे टूटे दिल की व्यथा आप तक पहुंचे कि –
।। शिव की गंगा भी पानी है,
आबे ज़म ज़म भी पानी है।।
।।मूल्ला भी पिए, पंडित भी पिए,
पानी का मज़हब क्या होगा।।
।।इन फिर्का परस्तों से पूछो,
क्या सूरज अलग बनाओगे।।
।।एक हवा में सांस है सबकी,
क्या हवा भी नई चलाओगे।।
तो साहब यहां कवि का तात्पर्य तो आप बखूबी समझ गए होंगे मगर रुकिए सिर्फ समझिए नहीं वरन् अमल कीजिए क्युकी शिव नाम है कर्मा का और हम सभी मे कहीं ना कहीं शिवांश है। यकीनन है तभी तो महाकाल सदैव यही कहते नज़र आए कि –
“हर हर महादेव” और वहीं दूसरी ओर मोहम्मद साहब भी यहीं कहते नज़र आए “उम्मति उम्मति”
दोनों का माने बिल्कुल वहीं है फिर भाषाओं के फेर की ये लड़ाई कैसी? जागृत होना ही असल शिक्षा या कहे धर्म है और इसी का नाम इंसानियत भी है मगर अफसोस कहीं ना कहीं आज कल ये ढूंढने पर बड़ी मुश्किल से मिलती है और मिलती भी है तो बड़ी खोई खोई से नज़र आती है।
दोस्तो आइए अपनी इस पीढ़ी में अलख जगाते है और इनके खोए हुए अतीत – भटकते हुए वर्तमान और कहीं ना कहीं बर्बाद होते इनके मुस्तागबिल को बचाया जाए ताकि हम अपनी गंगा – जामुनी तहज़ीब को स्वयं के अंदर विराजमान महादेव की आंख मे आंख मिलाकर जवाब दे सके। आत्मा से परमात्मा तक का ये सफरनामा अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते हुए ये “ना” कहता हुआ प्रतीत हो कि –
।।कल चमन था, आज एक सहरा हुआ।।
।। देखते ही देखते, ये क्या हुआ।।
आइए मिलकर पुरजोर आवाज़ आवाज़ उठाते है ऐसे सियासत के दानवों के ख़िलाफ़ और ये तभी मुमकिन है जब हम एक हों, हमारी आवाज़ एक हो।
इक़बाल साहब के इस शेर से विराम देना चाहूंगा कि –
“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”
“हिंदी है हम वतन है, हिंदोस्ता हमारा – हमारा”
“सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा”
यकीनन ये वहीं देश भक्ति से सराबोर अशआर है जिन्हे प्रारंभिक शिक्षा के दौरान हम सभी ने कहीं ना कहीं रोज़ाना अपनी प्रेयर यानी प्राथना के दौरान पूरी शिद्दत से पढ़ा करते थे। चलते चलते एक और गीत कि पंक्ति के साथ आपसे विदा चाहता हूं कि –
।। ये कारगिल तुम्हारा – ये काश्मीर तुम्हारा।।
।।गीता भी है तुम्हारी – कुरआन भी तुम्हारा।।
।।दुनियां को तुम दिखा दो – इस रास्ते पे चलके।।
।। ए देश के जवानों चलना ज़रा संभाल के।।
।।गद्दार आ रहे है सूरत बदल – बदल के।।
जय हिन्द – जय भारत – वन्दे मातरम।।