Friday, August 29, 2025

दो सच पारुल राज'(दिल्ली)

दो सच

थोड़ा सा रो लेने दो ना,
कुछ ऑंसु खो लेने दो ना।
आज देखा है ये मंज़र कि,
आँखे नम हो गयी।
एक जनाज़ा जा रहा था,
एक था नए दूल्हा दुल्हन का जोड़ा।
लोगों की भीड़ में भी दोनो ,
एक पल के लिए आमने सामने थे।
मैंने सहसा देखा और बस देखती ही रह गई,
थे दोनो सच और बिल्कुल सच,
फ़र्क था तो सिर्फ प्रारम्भ और अंत का।
एक था ज़िन्दगी की शाम ,
दूजा प्रारम्भ नई जिंदगी का।
एक था ,सबकुछ छोड़ ,
दूसरे लोक में जाता।
दूज भी कुछ ऐसा ही,
अपनो को छोड़ नए प्रारम्भ का आगाज़।
एक ने थे कुछ नए रिश्ते जोड़े,
दूजे ने सब पुराने रिश्ते तोड़े।
एक मे था साथ साजन का,
और थी ढेर सारी खुशियाँ और अपनों की अंजी।
एक था साथ सिर्फ खामोशी लिए
साथ साया भी ना था,था तो सिर्फ कर्मो का ब्यौरा।
वरिष्ठ लेखिका
‘ पारुल राज'(दिल्ली)

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