वर्तमान ‘पत्रकारिता’ के चरित्र को बौना कोई नहीं कर सकता
आइए एक चर्चा करते हैं पं.दीनदयाल उपाध्याय जं. जो एशिया का प्रसिद्ध रेलवे यार्ड से चर्चित व रेलवे स्टेशन के रूप में जाना जाने वाला एक बड़ा नाम हैं जो कभी मुग़लसराय जं. कहा जाता था।अब वही पण्डित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन हो गया हैं । नाम तो बदला लेकिन विवादों से इसका रिश्ता नहीं बदला समय के साथ विवादों का प्रकार बदलता गया । कभी स्टेशन के भिखारीओं को लेकर उनके विषय में भिखारियों की मस्ती की पाठशाला का समाचार चर्चा में रहा तो कभी किसी माननीय के ख़ास को चेकिंग ब्रांच द्वारा अर्थदंड का खबर,कभी बेंडरों का मामला तो कभी भारी भीड़ से हादसों का इतिहास ।
कुछ समय से यात्रियों की बढ़ती सुविधा और रेलवे स्टेशन का बदलता कायाकल्प यात्रियों को इस स्टेशन के सुख सुविधाओं की ओर आकर्षित कर रहा वही चेकिंग ब्रांच ,आर.पी.एफ व जी.आर.पी की तरफ से जनसेवा का भी बड़ा पहल रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला उसमे जीआरपी ने बड़े पैमाने पर अवैध सामानों को पकड़ा तो चेकिंग ब्रांच ने बीमार यात्रियों को चिकित्सा का मानवीय सहयोग प्रदान कर नगर के नाम को बड़ा किया।साफ सफाई में बढ़ोतरी,अवैध बेंडरों से मुक्ति ,रेलवे स्टेशन पर बिक्री के सामानों की गुणवत्ता में जहा विकास हुआ वही रेलवे महिला पुलिस ने मेरी सहेली बन एक कृतिमान परिवर्तन की दिशा में काम किया । लेकिन जहा सकारात्मक बदलाव हुए वही नकारात्मकता भी मुखर हुयी जिससे कई बार यात्री हितो की आड़ में निजस्वार्थ की चाह से कई बार सुरक्षा और चेकिंग ब्रांच को पत्रकारों की ओर से हुए शिकायतों के कारण रेलवे बोर्ड तक इस रेलवे स्टेशन,विभागों या कर्मचारियों का नाम उछला । कई बार तो यात्रियों के गलत बयानी से यह समस्या हुयी तो कई बार रेलवे से जुड़े विभागों की लापरवाही भी सामने आयी परंतु इस क्रम में कई बार पत्रकारों की अनुभव व सक्रियता से रेलवे के मामले निपटाए भी गये और रेलवे की तरफ से बड़ा बदलाव भी संभव हुआ। जब की कई एक मामले में पत्रकार होने का भय दिखा कर कुछ अवैध करने,करवाने व कुछ अनैतिक तय करने व करवाने के मामले भी सामने आये जिससे पत्रकारों का चरित्र भी दागदार हुआ और पत्रकारिता की साख भी कटघरे में खड़ी हुई । कुछ व्यवस्थाव्यथितों की निजस्वार्थ और निज विवादों के कारण जहा रेलवे विभाग असहज हुए वही अवैध वसूली की आरोप प्रत्यारोप में पत्रकार की भूमिका भी आरोप में उलझी हुई दिखी । पत्रकारिता के चरित्र को बौना कर अपने निज लाभ की प्राथमिकता से जब पत्रकार ,यात्री पर हमलावर होता हो या खानपान विभागों में बैठकी कर अपने व्यक्तिगत मांग से जुड़कर जब भी कोई स्वयं वादी व प्रतिवादी बनके खड़ा होता हैं तो पत्रकार और पत्रकारिता का साख बहुत ही गिर जाता हैं ऐसे हादसे पत्रकार को भी बेपर्दा करते हैं तो ऐसे कुछ एक घटनाओं के कारण सभी के सभी पत्रकारों की पत्रकारिता पर आरोप की उंगली उठ जाती हैं । जो बेहद दुःखद व निराशाजनक हैं। इस गंभीर विषय पर हम सभी भद्रजनों को सोचना व विचार करना चाहिए।
यह मेरा निजी विचार है किसी व्यक्ति विशेष से कोई लेना देना नहीं है।
संजय शर्मा
(वरिष्ठ पत्रकार)