श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के पांचवे दिन श्री कृष्ण बाल लीला व गोवर्धन पूजा प्रसंग ने श्रोताओं का मनमोहा
गोवर्धन पूजन के पश्चात भगवान को छप्पन भोग लगाकर प्रसाद किया गया वितरण
मधुपुर (सोनभद्र) यह संसार दुख का सागर है। यहां न कोई अमीर सुखी है और नही कोई गरीब सुखी है, जिसने परमात्मा को मन में बसा लिया उसे परम सुख की प्राप्ती होती है। कथा प्रवचन के दौरान वृंदावन मथुरा से पधारे युवा विद्वान ब्रजराज दास जी ने
भागवत कथा का प्रवचन करते हुए कहा कि इस संसार में कोई किसी का संबंधी नहीं है, परमात्मा से नाता जोड़ कर ही इस भवसागर से पार पाया जा सकता है। उन्होने यह भी कहा कि न घर तेरा है न घर मेरा है, यह तो चिडिया रैन बसेरा है एक दिन उड़ जाना है, दोहे की व्याख्या करते हुए कहा कि हरि नाम का सुमरिन करने के लिए कल का इंतजार नहीं करना चाहिए, कल किसने देखा है, जीवन में सुख-दुख की लहर आती जाती है। इसलिए प्रभु भक्ति में लिन रहते हुए अपने दुखों को भुल जाना चाहिए।
भागवत कथा वाचन के पांचवे दिन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लिलाओं का वृतांत सुनाते हुए कहा जब कंस को पता चला कि हमें मारने वाला कहीं जन्म ले चुका है, इस पर कंस घबरा गया। बलि की पुत्री पूर्व जन्म में रत्नमाला थी, दूसरे जन्म में पूतना हुई, इसी पूतना को भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए कंश नंद बाबा के घर भेजा। पूतना सज धज कर लक्ष्मी जैसा सुंदर स्वरूप बनाकर नंद बाबा के घर के अंदर पहुंच गई। भगवान पूतना को देख कर पूतना की हरकत समझ कर आंखें बंद कर लिया। इस पर पूछना भगवान को गोंद में उठाकर अपना स्तनपान कराने लगी,
भगवान श्री कृष्ण स्तनपान करने के साथ-साथ पूतना का प्राण भी पीने लगे, इस पर पूतना को काफी दर्द हुआ, चिल्लाने लगी, घबराकर भगवान कृष्ण को लेकर ही उड़ गई, कुछ दूरी पर जाकर पूछना अपना विशाल राक्षसी स्वरूप जो 84 किलोमीटर लंबा विशाल वास्तविक राक्षसी स्वरूप में धरती पर धणाम से गिर पड़ी, और मृत्यु को प्राप्त गई। इसके बाद बकासुर आया, बकासुर भी बकुले का विशाल स्वरूप का बनाकर उस स्थान पर खड़ा हो गया, जहां भगवान गोप वालों के साथ गांयें चराया करते थे। भगवान को देखते ही बकासुर अपनी सोच में दबाकर भगवान को लेकर उड़ने का प्रयास किया। परंतु भगवान बकासुर को मारकर बकासुर का उद्धार किया। इसी प्रकार अघासुर भी विशाल अजगर का स्वरूप बनाकर वृंदावन आया जहां भगवान ग्वाल वालों के साथ गाय चरा रहे थे। वहां पर धरती से आकाश तक अपना मुख खोलकर वहां लेट गया, यहां भगवान अघासुर का हरकत समझ कर ग्वाल बालों के साथ सभी गायों को अघासुर के मुख में प्रवेश करा दिए। भगवान सबसे पीछे जैसे ही पहुंचे अघासुर अपना मुंह बंद करने लगा।
इस पर भगवान अघासुर को भी मार अघासुर का उद्धार किया। गोवर्धन पूजा के प्रसंग के दौरान उन्होने बताया कि इसी प्रकार इंद्र को भी आकार हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पूजन करा कर इन्द्र के घमण्ड को चूर किया था। गिरिराज पूजन करने के लिए प्रेरित किया और इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी ऊंगली पर गिरिराज को धारण कर समस्त ब्रज वासियों को बचाया। संगीतमय कथा वाचन के दौरान पाण्डाल में उपस्थित सैंकडों की संख्या में श्रद्धालु भाव विभोर हो कर नृत्य करने के साथ् झूमने लगे। मुख्य यजमान गुंजन केसरी परिवार सहित पाण्डाल में उपस्थित श्रद्धालुओं द्वारा बाल स्वरूप श्रीकृष्ण की पूजा अर्चन कर छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया गया। तथा उपस्थित श्रोताओं में भक्ति मय संगीत पर झूम झूम कर खूब नृत्य किया। कथा के अंत में महाआरती के पश्चात प्रसाद वितरण किया गया।
कथा वाचक बजरंग दास जी ने व्यासपीठ से बताया कि श्रीमद भागवत कथा के छठे दिन शनिवार को श्रीकृष्ण एवं रूक्मणी विवाह प्रसंग की जीवंत झांकी के साथ कथा का वाचन किया जाएगा।
Up18news Report by Anand Prakash Tiwari