विषय _ काले मेघ
शीर्षक -मेरी पाती
विधा-कविता
जा रे काले काले मेघ
घुमड़ घुमड़ कर जाता जा।
जाकर मेरे बाबुल को,
मेरा यह संदेशा देता जा।
बहुत याद आती है ,
माँ के आँचल की ,और पिता की
बातों की।
उनको कहना मुझे बुला ले ,या
भैया को भेजें ।
नहीं बुला सकते ,अगर हो कोई
मजबूरी ,
तो मेरा यह संदेश समझ पढ़ लेंगे।
माँ,यह काले मेघ है ना यह बादल
नहीं ,
यह मेरे अश्रु धार है ,
और मेरी आँखों का काजल।
माँ,तूने समझाया था ना , कि
मौन हर को तार-तार कर देता है
और मैंने यह बात गांठ बांध ली।
लेकिन क्या करूँ,मैं जब हृदय
की पीर जब घाव में है बदल
जाती, है तब यह आँसू निकलते
हैं और, मेरी आंखों के काजल
को भी, संग बहा ले जाते हैं ।
माँ, तेरी दूसरी सीख भी मुझे याद
है।
तू कहती थी न, मायके से डोली
और ससुराल से अर्थी ही,
निकलती है बेटी की।
फिक्र न कर ,कोई न सुन
पाएगा ,मेरी वेदना की आहट।
क्योंकि मेरे अश्कों को इजाज़त
है मेघ के गर्जन की ओट
में,बहने की।
पारुल राज
(दिल्ली)
स्वरचित