Friday, August 21, 2026
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काले मेघ

विषय _ काले मेघ

शीर्षक -मेरी पाती

विधा-कविता

 

जा रे काले-काले मेघ,

घुमड़-घुमड़ कर जाता जा।

जाकर मेरे बाबुल को,

एक संदेशा देता जा।

 

बहुत याद आती है मुझको,

माँ का आँचल पिता की बातें।

उनको कहना मुझे बुला लें,

या फिर भैया को भेजें ।

 

नहीं बुला सकते,

अगर हो कोई मजबूरी।

तो मेरा यह संदेश समझ पढ़ लेंगे।

माँ,यह काले मेघ है- न,

यह बादल नहीं,

यह मेरे अश्रु धार हैं।

और मेरी आँखों का काजल।

 

माँ,तूने मुझे समझाया था न,

कि मौन हर वार को तार-तार कर देता है।

और मैंने यह बात गाँठ बाँध ली।

लेकिन क्या करूँ,मैं जब हृदय

की पीर जब घाव में है बदल

जाती है, तब यह आँसू निकलते

हैं। और मेरी आँखों के काजल

को भी, संग बहा ले जाते हैं ।

माँ, तेरी दूसरी सीख भी मुझे याद

है।

तू कहती थी न, मायके से डोली

और ससुराल से अर्थी ही,

निकलती है बेटी की।

फिक्र न कर ,कोई न सुन

 

पाएगा, मेरी वेदना की आहट।

क्योंकि मेरे अश्कों को इजाज़त

है मेघ के गर्जन की ओट

में, बहने की।

 

पारुल राज

(दिल्ली)

स्वरचित

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