Friday, August 29, 2025

एक छोटा सा आशियाँ हो अपना। वहाँ प्यार ही प्यार को रखना।

एक छोटा सा आशियाँ हो अपना।

वहाँ प्यार ही प्यार को रखना।

ज़मी हो जिसकी हिम्मत और हौसले की।

 

छत हो जिसकी विश्वास और वफ़ा की।

कोने हो जिसके शर्मो हया के।

हवा हो जिसमे जज़्बा ए ज़ीनत।

 

दिन हो जिसमे मंज़िलो की जीत के।

रातें हो जिसकी,सुनहले ख़्वाबों

की।

 

दरवाज़े हो जिसके , हो आगमन सुखो का।

खिड़कियाँ हो जिसकी,सादगी और सरलता की।

उजाले हों जिसमे प्यार के।

 

साथ हो जिसमे आप का।

मद्धम मद्धम सा संगीत हो जिसमे प्यार का।

भीनी भीनी सी सबा हो जिसमे वफ़ा की।

 

 

आना जाना हो सभी का ,दस्तक ना हो ज़रूरी।

ममता का सया हो जिसमें, हसना ना हो मजबूरी।

 

पारुल राज

दिल्ली

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