इंडिया’ की अदालत में मीडिया काली शंकर उपाध्याय की कलम से
यू तो मीडिया का इस्तेमाल सब लोग बखूबी करते हैं ,लेकिन आजकल एक ट्रेंड बहुत तेजी से चल रहा है कि मीडिया को बिका हुआ मीडिया कहने से भी कोई पीछे नहीं है रहा है चाहे वह राजनीतिक पार्टियों हो चाहे उनके फेंके हुए टुकड़ों पर पलने वाले लोग आजकल जिस तरह से मीडिया को सब लोग आड़े हाथ ले रहे है या बदनाम कर रहे हैं ,यह किसी से छुपा नहीं है लेकिन क्या सभी मीडिया वालों को एक ही तराजू के तौला जा सकता है जब खबर पक्ष में छपती है तब लोग बहुत वाह वाह करते हैं, लेकिन वही खबर जब विपक्ष में छपने लगती है तो लोगों के हवा टाइट हो जाती है आजकल महा गठबंधन वालो ने तो मीडिया को इस कदर बदनामी के कटघरे मिलकर खड़ा कर दिया है कि मानो लोगों की नजर से मीडिया का जो रुतबा है जो नाम है वह बदनाम हो रहा है,
कभी तेरे नाम से ही खबर पर ऐतवार होता था, आज तेरे लिखे पे नफरत फैलाने का इल्जाम है।’ पत्रकारिता ने अपने महत्त्व को इतना गिरा दिया है कि अब बहस का विषय बनकर कोई एंकर कठघरे में खड़ा है। विपक्षी एकता के नाम पर बन चुका गठबंधन लोकतंत्र की गांठ से मीडिया के एक हिस्से को अलहदा करके आखिर कहना क्या चाहता है और यह परिस्थितियां क्यों पैदा हुईं कि ‘कल तक जो हाशियों के बाहर कर रहे थे, आज अपनी ही महफिल से कट गए।’ मोदी सरकार के खिलाफ चुनावी चौपाल में हो रहे फैसलों का एक नज़ला अगर मीडिया पर गिर रहा है तो यह पत्रकारिता के गिरते मानदंड की चेतावनी भर नहीं, बल्कि भविष्य की मांद में एक खतरनाक आदेश पलने लगा है। मीडिया बनाम राजनीति का वर्तमान मुकाबला केवल 14 एंकरों का बहिष्कार नहीं कर रहा, बल्कि लोकतंत्र के तमाम स्तंभों के बीच जर्जर होते विश्वास, आपसी संतुलन और पारस्परिक भूमिका के क्षरण का भी संदेश दे रहा है। इसमें दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों में मीडिया खासतौर पर इलेक्ट्रिॉनिक मीडिया ने अपनी भाषा, शब्दावली, नैतिकता, संयम, विवेक, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक चरित्र को कहीं तो चोट पहुंचाई है, जिससे संपूर्ण पत्रकारिता में अस्थिरता, मौका परस्ती और कारपोरेटीकरण का बोलबाला हो गया। आश्चर्य यह कि कुछ चेहरे हाई प्रोफाइल या पंच सितारा पत्रकार बनकर, मीडिया व्यापार की पेशकश में कारिंदे हो गए। कुछ राजनीतिक बिचौलिए और कुछ समाज के भीतर नफरत के बीज बोने के माहिर हो गए।
पिछले सालों में जो मीडिया परिदृश्य उभरा है, उसमें पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और सत्यनिष्ठा में अत्यंत गिरावट के साक्ष्य सौंपे हैं। आज अगर विपक्षी गठबंधन की अदालत में मीडिया जगत के 14 चिन्हित चेहरे अछूत घोषित हो रहे हैं, तो यह असाधारण घटनाक्रम है और जिसके प्रभाव में पत्रकारिता के मनोबल को कहीं न कहीं चोट पहुंचेगी। विडंबना यह है कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की पार्टियां जहां सत्तारूढ़ हैं, वहां भी पत्रकारिता से अपेक्षाएं भिन्न या स्वतंत्र नहीं हैं। मीडिया स्वतंत्रता की कीमत या तो किसी आपराधिक केस में उलझ कर चुकानी पड़ रही है या सरकारी विज्ञापनों से किनारे लगाकर मिलती है। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार ने 2014-15 से दिसंबर 2022 तक प्रिंट मीडिया को 3138 करोड़ तथा इलेक्ट्रॉनिक को 3260 करोड़ के विज्ञापन बांटे हैं। जाहिर है इस धन का आबंटन मीडिया की छाती पर नहीं, घुटने टेकने की वजह से कहीं अधिक हुआ है। लेकिन यही परिदृश्य अब राज्य सरकारें भी बना रही हैं। दिल्ली में आप सरकार अगर छह सौ करोड़ के विज्ञापन बांट कर अपना प्रचार करती है, तो मीडिया के बीच कतारबद्ध होने की वजह भी है। आज कोई सत्ता मीडिया को मजबूत होते नहीं देख सकती, तो दूसरी ओर पत्रकारिता में ऐसे लोगों और उद्देश्यों की भीड़ एकत्रित हो रही है, जो न पेशेवर मानकों और न ही लोकतंत्र की जीवंतता के लिए संचालित होने का जज्बा रखते हैं।
समाचार के उपभोक्ता स्वरूप में मीडिया को सशक्त आकार देने का सामथ्र्य समाज से भी गायब हो रहा है। समाज और व्यवस्था के बीच नाच रहा मीडिया खुद की ताकत गंवा रहा है, तो धु्रवीकरण की आड़ में बहुसंख्यकवाद के गुनाहों से उसका हुलिया बदल चुका है। चौदह एंकरों का बहिष्कार यह तो बता रहा है कि मीडिया के आंचल में कितनी बेहयाई और बेशर्मी है, लेकिन दुरुस्ती के लिए यह कार्रवाई कहीं न कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी कठघरे में खड़ी कर रही है। जाहिर है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पतन कहीं गहरे तक है, लेकिन जब तक एंकरों के आका तक हाथ नहीं पहुंचेंगे, सत्ता से गलबहियां राष्ट्रीय स्तर से राज्यों की मिलकीयत तक जारी रहेंगी। बेहतर होगा इंडिया गठबंधन अपने राज्यों में मीडिया की स्वतंत्रता के लिए दिल खोलकर वकालत करे ताकि राष्ट्र तक यह संदेश पुख्ता हो जाए।