किसानों के लिए ‘वन आधारित गंगा अनुकूल आजीविका परियोजना’ का शुभारंभ: जापान के विशेषज्ञों ने सिखाया ‘बायोचार’ का कमाल


वाराणसी (चिरईगाँव)। गंगा किनारे के किसानों को उन्नत और पर्यावरण-अनुकूल खेती से जोड़ने के लिए चिरईगाँव मुस्तफाबाद ग्राम सभा में एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत हुई है। ग्राम प्रधान प्रतिनिधि पारशनाथ और अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के आसीस सिंह के सौजन्य से ‘वन आधारित गंगा अनुकूल आजीविका परियोजना’ का भव्य शुभारंभ किया गया। इस दौरान जापान से आए विशेषज्ञ दल ने किसानों को ‘बांस चारकोल’ यानी बायोचार के फायदे समझाए, जिससे खेती की लागत कम होगी और पैदावार बढ़ेगी।
🇯🇵 जापानी विशेषज्ञों ने दिया तकनीकी मार्गदर्शन
इस अवसर पर जापान की प्रतिष्ठित संस्था ओएस्का (OESCA) और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों की टीम मौजूद रही, जिसमें श्रीमान अकीरा मोरिटा (मैनेजिंग डायरेक्टर, ओएस्का), श्रीमान आतुशी चिदा (बंबू चारकोल एक्सपर्ट), और श्रीमान आकियो चिकुदा (नेचुरल फार्मिंग एक्सपर्ट) जैसे अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल थे। उन्होंने किसानों को बताया कि कैसे बांस या कृषि अपशिष्ट से बना चारकोल (बायोचार) मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता और उर्वरता को कई गुना बढ़ा देता है।
🗣️ ग्रामवासियों ने की पारशनाथ और आसीस सिंह के कार्य की सराहना
इस अनूठी और लाभप्रद परियोजना के लिए गाँव वालों ने ग्राम प्रधान प्रतिनिधि पारशनाथ और आसीस सिंह की खुलकर प्रशंसा की। उनका कहना था कि यह पहल सीधे किसानों की आय और मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़ी हुई है।

सुनील प्रजापति ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “पारशनाथ जी ने गाँव में ऐसा काम करवाया है जिसका फायदा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी मिलेगा। जापानी लोगों ने जो तकनीक बताई, वह वाकई खेती को बदलकर रख देगी।”
मुकेश मनिदर सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा, “आसीस सिंह जी और पारशनाथ जी ने मिलकर हमारे गाँव का नाम ऊँचा किया है। यह परियोजना दिखाती है कि अगर प्रतिनिधि काम करने वाला हो, तो किसानों की दशा सुधर सकती है।”
राघवेन्द्र सिंह ने सीधे तौर पर भविष्य की बात करते हुए कहा, “पारशनाथ जी ने पिछले कार्यकाल में इतने अच्छे काम किए हैं कि गाँव की पूरी जनता उन्हें आगे भी ग्राम प्रधान के रूप में ही देखना चाहती है। ऐसे दूरदर्शी नेता गाँव के विकास के लिए जरूरी हैं।”
🌱 परियोजना का लक्ष्य: गंगा अनुकूल और टिकाऊ खेती
आयोजकों ने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करना, गंगा के पर्यावरण को स्वच्छ रखना और किसानों को कम लागत में अधिक उपज प्राप्त करने के तरीके सिखाना है। यह मुस्तफाबाद को जैविक और टिकाऊ खेती का मॉडल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।







