फिराक गोरखपुरी का सोनभद्र से रिश्ता रहा है।
सोनभद्र-उर्दू साहित्य के महान शायर रघुवीर सहाय साहित्यिक उपनाम फिराक गोरखपुरी का (पूर्व जनपद मिर्जापुर) सोनभद्र जनपद से अटूट संबंध रहा है। इनका आगमन जनपद सोनभद्र के साहित्यिक मंच पर कई बार हो चुका है।
आज इनकी पुण्यतिथि पर जनपद के साहित्यकारों के साहित्यिक संबंधों पर चर्चा समचीन होगी।
मधुरिमा साहित्य गोष्ठी के निदेशक वरिष्ठ साहित्यकार अजय शेखर के अनुसार-वाकया उन दिनों का है जब सोनभद्र जनपद मिर्जापुर जनपद का भूभाग था और यह क्षेत्र मिर्जापुर के दक्षिणांचल के नाम से प्रसिद्ध था, दक्षिणांचल में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए फिराक गोरखपुरी सोनभद्र की यात्रा पर आए थे और उनसे मेरी मुलाकात रॉबर्ट्सगंज नगर में हुई थी,घंटों हिंदी उर्दू भाषा के साहित्य पर चर्चा के बाद वे कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए रेणुकूट गए थे।
इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी के अनुसार-“सोनभद्र जनपद के मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज के निवासी, प्रख्यात उर्दू के शायर विश्वनाथ प्रसाद खादिम से इनके साहित्यिक तालुकात थे और इन दोनों महान शायरों ने देश- प्रदेश के कई नामचीन मंच पर एक साथ शिरकत किया था।
रघुपति सहाय ने जिस प्रकार अपना साहित्यिक उपनाम “फिराक गोरखपुरी” रखा, उसी तरह बीएन बाबू (विश्वनाथ प्रसाद) ने अपने आपको मां सरस्वती का आराधक मानते हुए साहित्य सेवा के लिए अपना साहित्यिक उपनाय “खादिम” रखा और इसी उपनाम से दोनों शायर प्रसिद्ध हुए।
फिराक गोरखपुरी से खादिम साहब का प्रथम परिचय इलाहाबाद में आयोजित एक मुशायरे में हुआ था ।
कालांतर में यह परिचय दोस्ती में बदल गया, उस समय के साहित्यिक समाज में यह जोड़ी इतनी लोकप्रिय हुई कि मुशायरे का आयोजन करने वाली साहित्यिक संस्थाएं अपने कार्यक्रम में इन दोनों शायरो को शिरकत करने के लिए आमंत्रित करती थी। इन दोनों महान शायरों ने एक साथ देश के कई मंचों पर शिरकत किया और श्रोताओं की वाहवाही लूटी।
एक बार मिर्जापुर में आयोजित मुशायरे में फिराक गोरखपुरी ने साफ-साफ कहा था कि मैं सिर्फ खादिम को सुनने आया हूं।
फिराक गोरखपुरी एवं खादिम मित्र, सहयोगी रहे और आपस में इनके संबंध इतने प्रगाढ़ थे कि वह मंच पर भी एक दूसरे की चुटकी लेने से नहीं चूकते थे।
ऐसा ही एक वाकया है एक बार दोनों शायर मंच पर मुशायरे मे शिरकत कर रहे थे, फिराक साहब ने बेहतरीन अंदाज में अपनी शेर-ए शायरी पढा और जनता ने उनके शायरी पर खूब तालियां बजाई जब उनका समय समाप्त हुआ तो उन्होंने खादिम साहब की चुटकी लेते हुए माइक से बड़े ही चुट्टीले अंदाज में खादिम साहब की ओर मुखातिब होकर कहा-” ऐ खादिम उठ! यह सुनकर खादिम साहब के साथ- साथ श्रोता भी मुस्कुरा उठे। जैसे ही उन्होंने माइक थामा वैसे ही श्रोताओं ने तालियों से उनका स्वागत किया।
साथ ही उन्होंने बड़े ही मस्ती भरे अंदाज में चुटकी लेते हुए कहा कि-” खादिम हूं नौकर नहीं शायर हूं प्रोफेसर नहीं।” इतना सुनते ही जनता ठहाका लगाकर हंसने लगी और फिराक गोरखपुरी भी मुस्कुरा उठे।
फिराक गोरखपुरी के खादिम कहने का अर्थ नौकर से ही था और इस बात को खादिम साहब ने महसूस किया और उस समय फिराक गोरखपुरी सुप्रसिद्ध शायर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर थी थे।
ऐसी बहुत सी मनोरंजक स्मृतियां फिराक गोरखपुरी खादिम साहब से जुड़ी हुई हैं जिसका वर्णन डॉक्टर अर्जुनदास केसरी के संपादन एवं लोकरुचि प्रकाशन से प्रकाशित एवं विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट द्वारा विमोचित पुस्तक “खादिम एक खुशबू” में दुर्लभ फोटोग्राफ के साथ संग्रहित है।
Up 18 news report by Chandra Mohan Shukla