कलम के सिपाही “अर्शी मिर्ज़ा” की कलम से –
।।सब कर्मों का लेखा है भैय्या फिर “काहे डर नाही”।।
एक अजीमो – शान शायर के इस शेर से शुरुआत करना चाहता हूं कि –
।।उम्र भर “अर्शी” यही भूल करता रहा – धूल चेहरे पे थी और आइना साफ करता रहा।।
पाठकों मैंने बड़े विचारने के बाद आज काफी समय के बाद फिर से कलम को तकलीफ देना अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी समझी क्युकी अगर कलम कार खामोश होता जाएगा तो समाज अस्थिर होता चला जाएगा और अंततः जवाब देहि भी अपनी ही होगी।
आज मैंने अपने आर्टिकल मे ऐसे विषय को चुना है जिनका पूरा दारो – मदार हमारे समाज के उन संवेदनशील पहलुओं को छूता नजर आएगा जहां से सभी शायद कहीं ना कहीं मैं खुद भी इसे अपनी नजर से नजर – अंदाज़ करते चले आ रहे है।
जी हां वो शब्द है – “सब कर्मों का लेखा” सवाल यहीं से आरंभ होता है और समझने का सिलसिला भी क्युकी शायद हम सभी इस शब्द से भली भांति परिचित होते हुए भी कहीं ना कहीं अनजाने बांटे हुए नज़र आए सवाल है क्यों? क्या ऐसा करके हम अपने आप को, अपनी नियति को, अपने भविष्य और सबसे आवश्यक अपनी ही आत्मा के पुनर्वास के सिद्धांतो को ताक पर रखते हुए प्रतीत नहीं हो रहे, सवाल है हम ऐसे अनजान क्यों? आइए समझते है आत्मा के पुनर्वास के सिद्धांतो को जिसे शायद हम सभी आज कि भागंभाग की ज़िन्दगी में ताक पर रखते हुए अपने ही भविष्य और अपने सबसे करीबी हमसफर को अंधेरे में झोंकते नज़र आ रहे है। आखिर क्यों और कब तक? क्या हम उन सबक को भूल गया जो हम सभी ने अपने पूर्वजों और इतिहासकारों से सुना है मुझे लगता है शायद हम भूल ही चुके है तो आइए कुछ बातें याद करा देना ही मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी है और वो इस एक शेर से शायद आप अच्छी तरह समझ सकते है एक अज़ीम शायर जिन्हें हम सभी “मिर्ज़ा ग़ालिब” के नाम से जानते है उन्होंने अपने इस शेर से हमे ज़िन्दगी के बेहतरीन पहलुओं को समझने का या यूं कहे कि – अंतरा – वलोकन का एक अनूठा प्रयत्न किया है जो ये है –
“उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा।।
।।धूल चेहरे पे थी और आइना साफ करता रहा।।
शायद नहीं, यकीनन आज समाज में हम सभी इस तमगे की फिराक में ज़िन्दगी के आयाम गुज़ार रहे है कि हम सबसे बेहतर भले ही अंदर झांकने पर मामला ज़ीरो ब टा सन्नाटा प्रतीत होता हुआ नजर आता है मगर साहब किया भी क्या जा सकता है ऊपर लिखे शेर के किरदार हम खुद ही तो है फिर शिकवा किस बात का।
मैंने आइने से पूछा कि मैं कैसा? उसने पलटते है कहा कि –
।।तू जो चाहे तो हवाओं को पलट सकता है – तेरा किरदार बलाओ को झपट सकता है – मैं तो बस आस मे हूं की तू करता क्या है –
तेरे एक इशारे से मैं हालात बदल सकता हूं।।
ये चीख चीख कर मेरे मन ने मुझसे गुहार की मगर अफसोस की मन की इस बात को भी मैंने बिना ग़ौर किए इग्नोर किया, नतीजतन मैं आज अपने अंदर ही अंदर कसकता रहा और अंततः बिना लिखे रह ना सका।
दोस्तो आज मौजूदा इस महामारी के दौर में हमें और आपको अगर कोई बचा रहा है और इससे बाहर निकाल रहा है तो वो सिर्फ और सिर्फ हमारे और आपकी अंतर आत्मा की शक्ति जिसे हम “खुदी” कहते है, यकीनन वहीं है इसीलिए तो कहा गया है कि –
।। मन के हारे हार है ।।
।। मन के जीते जीत ।।
दोस्तो आइए आज मिलकर इस महामारी से डटकर लड़ते हुए अपने और अपनों की मदद करे फिर वो मदद आर्थिक हो, शारीरिक हो या फिर मानसिक जैसे भी जिस तरह से भी हम सक्षम है हम करते रहे ताकि कल वक्त की आंखो मे आंखे डालकर और अपनी खुदी से आंख मिलाकर कह सके कि मैंने अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने में कोई कसर नहीं बाक़ी रखी और सबसे अमूल्य ये की कल मुझे खुद किं नजरो से ना गिरना पड़े।
दोस्तों सब कर्मों का लेखा है ये कहने से क्या ये बेहतर ना हो कि हम सब इस कठिन परन्तु अटल सत्य पर चलकर अपने आप को सिद्ध कर ले।
मैंने एक छोटी सी कोशिश की है अपने इस आर्टिकल के माध्यम से कि शायद समाज की इस अंतिम व्यक्ति तक अगर मेरी बात पहुंचे और हम सभी मिलकर अपने ही द्वारा रचित इस घरौंदे को उजड़ने ना दे और समाज का ताना – बाना भी ना विखंडित होने पाए इस आखिरी शेर के साथ मैं अपनी कलम को विराम देना चाहूंगा कि:- ।।खुदी को कर बुलंद इतना, की हर तकदीर से पहले,
।।खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।।