वरिष्ठ पत्रकार एवं जिला अध्यक्ष भारतीय पत्रकार संघ अनिल द्विवेदी जी द्वारा बताया गया नवरात्रि के पांचवें दिन का महत्व
वरिष्ठ पत्रकार एवं जिला अध्यक्ष भारतीय पत्रकार संघ अनिल द्विदेदी जी द्वारा बताया गया नवरात्रि के पांचवें दिन का महत्व

स्कंध माता दुर्गा माता का पाँचवाँ स्वरूप हैं, जिन्हें नवरात्रि के पाँचवें दिन पूजा जाता है। उनका नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—‘स्कंध’ और ‘माता’, जहाँ ‘स्कंध’ का अर्थ है कार्तिकेय (भगवान शिव और पार्वती के पुत्र) और ‘माता’ का अर्थ है मां। इस रूप में माता पार्वती अपने पुत्र स्कंध (कार्तिकेय) को अपनी गोद में लेकर विराजित रहती हैं, इसलिए उन्हें स्कंध माता कहा जाता है।
🔱 स्कंध माता का स्वरूप:
स्कंध माता की चार भुजाएँ होती हैं।
वे एक हाथ में अपने पुत्र स्कंध (कार्तिकेय) को गोद में लिए रहती हैं।
एक हाथ में कमल का फूल, एक में वरमुद्रा और एक में कमंडल धारण करती हैं।
इनका वाहन सिंह है।
इनका वर्ण गौर (श्वेत) होता है।
वे कमल के आसन पर भी विराजमान होती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहते हैं।
🙏 स्कंध माता की पूजा का महत्व:
स्कंध माता की उपासना से धैर्य, शक्ति और संयम की प्राप्ति होती है।
साधक को आध्यात्मिक एवं सांसारिक दोनों लाभ मिलते हैं।
इनकी कृपा से बुद्धि, ज्ञान और विवेक में वृद्धि होती है।
माता की पूजा करने से संतान संबंधी कष्ट भी दूर होते हैं।वे भक्तों को शौर्य, साहस और युद्ध-नीति में पारंगत करती हैं (जैसे उनके पुत्र कार्तिकेय युद्ध के देवता हैं)।
🕉 मंत्र:
ॐ देवी स्कन्धमातायै नमः॥
📜 स्कंध माता की कथा संक्षेप में:
जब दैत्य तारकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया था और उसे यह वरदान प्राप्त था कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उसे मार सकता है, तब शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। कार्तिकेय ने बड़े होकर तारकासुर का वध किया। स्कंध माता ही वह शक्ति हैं जिन्होंने अपने पुत्र को पाल-पोसकर इतना योग्य बनाया। इसलिए उनकी पूजा मातृत्व और शक्ति के अद्वितीय स्वरूप के रूप में की जाती है।
जै स्कंध माता🙏🙏
चंदौली से अनिल कुमार उपाध्याय एक रिपोर्ट