बेटी दिवस मनाना अच्छा है परंतु बेटियों को समझना बड़ी बात – बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी,
घोरावल – राम अनुज धर द्विवेदी
भारत में 25 सितंबर के दिन बेटी दिवस मनाया जाएगा। खास तौर पर यह दिन बेटियों के लिए समर्पित है। वैसे तो इस खास दिवस को अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है। लेकिन भारत में इसे सितंबर महीने के चौथे रविवार को मनाया जाता है। बेटियों को प्यार जताने के उद्देश्य से बेटी दिवस मनाया जाता है। बता दें कि सिर्फ बेटियों के लिए ही नहीं बल्कि मां, पिता, बेटा के साथ-साथ दादा-दादी के लिए भी साल में एक खास दिन होता है।
भारत में बेटी दिवस मनाने की वजह लोगों को बेटीयों के प्रति जागरुक करना है। बेटी को जन्म से पहले मारना, उसे पढ़ने-लिखने ना देना, घरेलू हिंसा, दुष्कर्म जैसे कुरूतियों से निकलने के लिए भारतीयों को जागरुक करने के लिए इस दिवस को मनाया जाता है। बेटी दिवस यही समझाता है कि बेटियां बोझ नहीं होती, बल्कि आपके घर का एक अहम हिस्सा होती हैं।
विचारणीय तथ्य यह है कि क्या वास्तव में एक दिन बेटी दिवस के रूप में मना कर, उनके लिए शायरी, कविता लिख कर, उनके साथ फोटो लगा कर, उनके लिए अच्छा सा उपहार ला कर हम अपनी जिम्मेदारियों व कार्यों से मुक्त हो गए एवं पूरे वर्ष तक के लिए निश्चिंत भी की अब हमारे देश की बेटियां सुरक्षित हैं।हमारी सोच बेटियों के विषय मे भी अपने – पराये पर आ कर रुक जाती है कि हमारी है तो सुरक्षित रहे पर दूसरे की है तो उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी नहीं है। हम ये जिस दिन से सोच लें कि यदि कोई बच्ची कभी भी कहीं भी अकेले है चाहे वो किसी की भी हो, वो बच्ची हम सबकी पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हम सभी उसे सकुशल उसके गन्तव्य तक पहुँचा कर कम से कम स्वयं की दृष्टि में ही अच्छे बने रहें। हमारे इसी समाज मे जहां एक दिन बेटी दिवस मनाया जा रहा है जहां एक तरफ कहा जा रहा है कि “#मेरी_बेटी_मेरा_अभिमान”, “#बेटी_बचाओ,#बेटी_पढ़ाओ” इत्यादि वहीं दूसरी तरफ कितनी गंदी सोच वाले लोग भी हैं हमारे समाज में जहां एक 4 से 5 माह की बच्ची भी सुरक्षित नहीं है।
बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी ने शनिवार को बताया कि एक तरफ किसी बेटी का विवाह हो रहा है तो ससुराल वाले कहते मिलेंगे की हम बहू नहीं बेटी ले कर जा रहे हैं परंतु क्या वास्तव में ऐसा होता है? जवाब आपके स्वयं के पास है शायद। हम ये नहीं कहते कि हर व्यक्ति की यही सोच है कहीं कहीं हमारी भी बेटी की गलती हो सकती है ना क्योंकि शायद जीवन की इस भाग – दौड़ में हमने उन्हें संस्कार व सभ्यता सिखाई है परंतु पूर्ण रूपेण वह उन संस्कारों व हमारी मान मर्यादाओं के अनुरूप स्वयं को न ढल पाई हो तो हमारा कर्तव्य तब भी बनता है कि हम उसे आराम से समझ कर उसका जीवन सवारें न कि उसके घर मे दखलंदाजी करें।कहने को बहुत कुछ है परंतु फिर कभी समयानुसार बात होगी इस विषय पर भी अभी तो मात्र इतना ही कहना चाहेंगे हम कि #बेटी_दिवस मनाना बहुत अच्छी बात है परंतु बेटियों को #समझना बड़ी बात है।