Thursday, February 26, 2026

दिपावली के सुबह नकारात्मक रुपी दरिद्रता को डंडे से भगाई माताएं

दिपावली के सुबह नकारात्मक रुपी दरिद्रता को डंडे से भगाई माताएं

चन्दौली :- दिपावली के सुबह घर की माताएं पुराने टूटे वस्तु को हंसिये से पिटते हुए घर के कोने कोने मे जाकर ये बोलती है कि ईश्वर पईठै दरिदर भागै ।
भोर में दरिद्रता भगाने की परंपरा का अर्थ और क्या हो सकता है दरिद्रता केवल गरीबी नही बल्कि यहाँ दरिद्र शब्द सिर्फ आर्थिक दरिद्रता का प्रतीक नहीं है, बल्कि आलस्य, नकारात्मकता, अशुद्धता, रोग, क्लेश, दुर्भाग्य और मानसिक जड़ता का भी प्रतीक है। जो दीपावली के दिन प्रकाश और समृद्धि पर लक्ष्मी माता का आगमन माना जाता है, जो धन, समृद्धि और शुभता की देवी हैं। माना जाता है कि लक्ष्मी वहीं वास करती हैं जहाँ स्वच्छता, सजगता, और धार्मिकता होती है।
दरिद्र भगाना मन, घर और जीवन से नकारात्मकता हटाना होता है।
दीपावली की भोर में झाड़ू लगाकर, मंत्र बोलकर या दरवाजे पर आवाज़ लगाकर दरिद्रता को “बाहर निकालने” की जो रस्म की जाती है, वह एक तरह की सांकेतिक प्रक्रिया है जैसे जीवन के अंधकार को पीछे छोड़कर, नई शुरुआत की जा रही हो।

गृहस्वामिनी या परिवार की बुजुर्ग महिलाएं भोर में झाड़ू लगाती हैं, और कूड़ा-कचरा निकालते समय कहती हैं:
“दरिद्र भगो, लक्ष्मी आवो!”
या ईश्वर पईठै, दरिद्दर भागै।
कुछ स्थानों पर दरवाज़े पर जल छिड़का जाता है और दीप जलाकर दरिद्रता को प्रतीकात्मक रूप से बाहर किया जाता है।
कई स्थानों पर घर की उत्तर दिशा में झाड़ू लगाकर दरिद्र भगाने की विशेष विधि होती है। यह एक सकारात्मक मन को तैयार करने की प्रक्रिया है। जब हम कहते हैं “दरिद्र भाग गया”, तो हमारा मन अपने ही अंदर एक विश्वास जगा लेता है कि अब नया आरंभ हो रहा है।
यह परंपरा सफाई और अनुशासन को बढ़ावा देती है। घर साफ करना, पुराने और अनुपयोगी वस्तुओं को हटाना, और चीजों को सुव्यवस्थित करना – ये सभी चीजें मानसिक शुद्धता लाती हैं।
आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि पुरानी नकारात्मकताओं को छोड़कर आगे बढ़ना जरूरी है।दीपावली के समय अगर हम न सिर्फ घर, बल्कि मन और रिश्तों की भी सफाई करें, तो यह उत्सव और भी अर्थपूर्ण हो जाता है।
दीपावली की भोर में दरिद्र भगाने की परंपरा केवल एक रिवाज नहीं, बल्कि जीवन को प्रकाश की ओर ले जाने की एक प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह हमें स्मरण कराती है कि जब तक हम भीतर से अंधकार, दरिद्रता और दुर्भावना को नहीं निकालते, तब तक सच्ची “लक्ष्मी” नहीं आ सकती।

चंदौली से ~ परीक्षित उपाध्याय की एक रिपोर्ट

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